दोस्ती की परख
एक जंगल था । गाय, घोड़ा, गधा और बकरी वहाँ चरने आते थे । उन चारों में मित्रता हो गई । वे चरते-चरते आपस में कहानियाँ कहा करते थे । पेड़ के नीचे एक खरगोश का घर था । एक दिन उसने उन चारों की मित्रता देखी ।
खरगोश पास जाकर कहने लगा - "तुम लोग मुझे भी मित्र बना लो ।"उन्होंने कहा - "अच्छा ।" तब खरगोश बहुत प्रसन्न हुआ । खरगोश हर रोज़ उनके पास आकर बैठ जाता । कहानियाँ सुनकर वह भी मन बहलाया करता था ।
एक दिन खरगोश उनके पास बैठा कहानियाँ सुन रहा था । अचानक शिकारी कुत्तों की आवाज़ सुनाई दी । खरगोश ने गाय से कहा - "तुम मुझे पीठ पर बिठा लो । जब शिकारी कुत्ते आएँ तो उन्हें सींगों से मारकर भगा देना ।"
गाय ने कहा - "मेरा तो अब घर जाने का समय हो गया है ।"तब खरगोश घोड़े के पास गया । कहने लगा - "बड़े भाई ! तुम मुझे पीठ पर बिठा लो और शिकारी कुत्तोँ से बचाओ । तुम तो एक दुलत्ती मारोगे तो कुत्ते भाग जाएँगे ।"घोड़े ने कहा - "मुझे बैठना नहीं आता । मैं तो खड़े-खड़े ही सोता हूँ । मेरी पीठ पर कैसे चढ़ोगे ? मेरे पाँव भी दुख रहे हैं । इन पर नई नाल चढ़ी हैं । मैं दुलत्ती कैसे मारूँगा ? तुम कोई और उपाय करो ।
तब खरगोश ने गधे के पास जाकर कहा - "मित्र गधे ! तुम मुझे शिकारी कुत्तों से बचा लो । मुझे पीठ पर बिठा लो । जब कुत्ते आएँ तो दुलत्ती झाड़कर उन्हें भगा देना ।"गधे ने कहा - "मैं घर जा रहा हूँ । समय हो गया है । अगर मैं समय पर न लौटा, तो कुम्हार डंडे मार-मार कर मेरा कचूमर निकाल देगा ।"तब खरगोश बकरी की तरफ़ चला ।
बकरी ने दूर से ही कहा - "छोटे भैया ! इधर मत आना । मुझे शिकारी कुत्तों से बहुत डर लगता है । कहीं तुम्हारे साथ मैं भी न मारी जाऊँ ।"इतने में कुत्ते पास अ गए । खरगोश सिर पर पाँव रखकर भागा । कुत्ते इतनी तेज़ दौड़ न सके । खरगोश झाड़ी में जाकर छिप गया । वह मन में कहने लगा - "हमेशा अपने पर ही भरोसा करना चाहिए ।"
सीख - दोस्ती की परख मुसीबत मे ही होती है। दोस्ती की परख मुसीबत मे ही होती है।
बोलने वाली मांद
किसी जंगल में एक शेर रहता था। एक बार वह दिन-भर भटकता रहा, किंतु भोजन के लिए कोई जानवर नहीं मिला। थककर वह एक गुफा के अंदर आकर बैठ गया। उसने सोचा कि रात में कोई न कोई जानवर इसमें अवश्य आएगा। आज उसे ही मारकर मैं अपनी भूख शांत करुँगा।
उस गुफा का मालिक एक सियार था। वह रात में लौटकर अपनी गुफा पर आया। उसने गुफा के अंदर जाते हुए शेर के पैरों के निशान देखे। उसने ध्यान से देखा। उसने अनुमान लगाया कि शेर अंदर तो गया, परंतु अंदर से बाहर नहीं आया है। वह समझ गया कि उसकी गुफा में कोई शेर छिपा बैठा है।
चतुर सियार ने तुरंत एक उपाय सोचा। वह गुफा के भीतर नहीं गया।उसने द्वार से आवाज लगाई- ‘ओ मेरी गुफा, तुम चुप क्यों हो? आज बोलती क्यों नहीं हो? जब भी मैं बाहर से आता हूँ, तुम मुझे बुलाती हो। आज तुम बोलती क्यों नहीं हो?’
गुफा में बैठे हुए शेर ने सोचा, ऐसा संभव है कि गुफा प्रतिदिन आवाज देकर सियार को बुलाती हो। आज यह मेरे भय के कारण मौन है। इसलिए आज मैं ही इसे आवाज देकर अंदर बुलाता हूँ। ऐसा सोचकर शेर ने अंदर से आवाज लगाई और कहा-‘आ जाओ मित्र, अंदर आ जाओ।’
आवाज सुनते ही सियार समझ गया कि अंदर शेर बैठा है। वह तुरंत वहाँ से भाग गया। और इस तरह सियार ने चालाकी से अपनी जान बचा ली।
बुधवार, 29 सितंबर 2010
शनिवार, 11 सितंबर 2010
श्रीगणेश कथा
श्री गणेश जन्म कथा
श्रीगणेश के जन्म की कथा भी निराली है। वराहपुराण के अनुसार भगवान शिव पंचतत्वों से बड़ी तल्लीनता से गणेश का निर्माण कर रहे थे। इस कारण गणेश अत्यंत रूपवान व विशिष्ट बन रहे थे। आकर्षण का केंद्र बन जाने के भय से सारे देवताओं में खलबली मच गई। इस भय को भाँप शिवजी ने बालक गणेश का पेट बड़ा कर दिया और सिर को गज का रूप दे दिया।

दूसरी कथा शिवपुराण से है। इसके मुताबिक देवी पार्वती ने अपने उबटन से एक पुतला बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने इस प्राणी को द्वारपाल बना कर बैठा दिया और किसी को भी अंदर न आने देने का आदेश देते हुए स्नान करने चली गईं। संयोग से इसी दौरान भगवान शिव वहाँ आए। उन्होंने अंदर जाना चाहा, लेकिन बालक गणेश ने रोक दिया। नाराज शिवजी ने बालक गणेश को समझाया, लेकिन उन्होंने एक न सुनी।
क्रोधित शिवजी ने त्रिशूल से गणेश का सिर काट दिया। पार्वती को जब पता चला कि शिव ने गणेश का सिर काट दिया है, तो वे कुपित हुईं। पार्वती की नाराजगी दूर करने के लिए शिवजी ने गणेश के धड़ पर हाथी का मस्तक लगा कर जीवनदान दे दिया। तभी से शिवजी ने उन्हें तमाम सामर्थ्य और शक्तियाँ प्रदान करते हुए प्रथम पूज्य और गणों का देव बनाया।
सबक गणेश के पास हाथी का सिर, मोटा पेट और चूहा जैसा छोटा वाहन है, लेकिन इन समस्याओं के बाद भी वे विघ्नविनाशक, संकटमोचक की उपाधियों से नवाजे गए हैं। कारण यह है कि उन्होंने अपनी कमियों को कभी अपना नकारात्मक पक्ष नहीं बनने दिया, बल्कि अपनी ताकत बनाया। उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सूंड बताती है कि सफलता का पथ सीधा नहीं है।
यहाँ दाएँ-बाएँ खोज करने पर ही सफलता और सच प्राप्त होगा। हाथी की भाँति चाल भले ही धीमी हो, लेकिन अपना पथ अपना लक्ष्य न भूलें। उनकी आँखें छोटी लेकिन पैनी है, यानी चीजों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करना चाहिए। कान बड़े है यानी एक अच्छे श्रोता का गुण हम सबमें हमेशा होना चाहिए।
श्री गणेशजी की आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ॥ जय...

एक दन्त दयावन्त चार भुजा धारी।
माथे सिन्दूर सोहे मूसे की सवारी ॥ जय...
अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥ जय...
हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा ॥ जय...
दीनन की लाज रखो, शम्भु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जाऊँ बलीहारी॥ जय...
आरती-2
सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मन कामनांपुरती॥ जय देव...
रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा।
हिरेजड़ित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरीया॥ जय देव...
लंबोदर पीतांबर फणीवर बंधना।
सरळ सोंड वक्रतुण्ड त्रिनयना।
दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकष्टी पावावें, निर्वाणी रक्षावे,
सुरवरवंदना॥ जय देव...
आरती-3
शेंदुर लाल चढ़ायो अच्छा गजमुखको।
दोंदिल लाल बिराजे सुत गौरिहरको।
हाथ लिए गुडलद्दु साँई सुरवरको।
महिमा कहे न जाय लागत हूँ पादको ॥1॥

जय जय जी गणराज विद्या सुखदाता।
धन्य तुम्हारा दर्शन मेरा मन रमता ॥धृ॥
अष्टौ सिद्धि दासी संकटको बैरि।
विघ्नविनाशन मंगल मूरत अधिकारी।
कोटीसूरजप्रकाश ऐबी छबि तेरी।
गंडस्थलमदमस्तक झूले शशिबिहारि ॥2॥
भावभगत से कोई शरणागत आवे।
संतत संपत सबही भरपूर पावे।
ऐसे तुम महाराज मोको अति भावे।
गोसावीनंदन निशिदिन गुन गावे ॥3॥
आरती-4
घालीन लोटांगण वंदीन चरण।
डोळ्यांनी पाहिन रूप तुझे ।
प्रेमें आलिंगीन आनंद पूजन।
भावे ओवाळिन म्हणे नामा॥

त्वमेव माता पिता त्वमेव।
त्वमेव बंधुः सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा।
बुध्यात्मना वा प्रकृति स्वभावत्।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै।
नारायणायेती समर्पयामि॥
अच्युतं केशवं राम नारायणम्।
कृष्णदामोदरं वासुदेवं भजे।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभम्।
जानकीनायकं रामचंद्रं भजे॥
आरती-5
जय गणेशाय नमः
प्रारंभी विनती करू गणपती विद्यादयासागरा।
अज्ञानत्व हरोनी बुद्धि मती दे आराध्य मोरेश्वरा
चिंता, क्लेश, दरिद्र दुःख अवघे,

देशांतरा पाठवी।
हेरंबा गणनायका गजमुखा भक्तां बहू तोषवीं॥
श्रीगणेश के जन्म की कथा भी निराली है। वराहपुराण के अनुसार भगवान शिव पंचतत्वों से बड़ी तल्लीनता से गणेश का निर्माण कर रहे थे। इस कारण गणेश अत्यंत रूपवान व विशिष्ट बन रहे थे। आकर्षण का केंद्र बन जाने के भय से सारे देवताओं में खलबली मच गई। इस भय को भाँप शिवजी ने बालक गणेश का पेट बड़ा कर दिया और सिर को गज का रूप दे दिया।

दूसरी कथा शिवपुराण से है। इसके मुताबिक देवी पार्वती ने अपने उबटन से एक पुतला बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने इस प्राणी को द्वारपाल बना कर बैठा दिया और किसी को भी अंदर न आने देने का आदेश देते हुए स्नान करने चली गईं। संयोग से इसी दौरान भगवान शिव वहाँ आए। उन्होंने अंदर जाना चाहा, लेकिन बालक गणेश ने रोक दिया। नाराज शिवजी ने बालक गणेश को समझाया, लेकिन उन्होंने एक न सुनी।
क्रोधित शिवजी ने त्रिशूल से गणेश का सिर काट दिया। पार्वती को जब पता चला कि शिव ने गणेश का सिर काट दिया है, तो वे कुपित हुईं। पार्वती की नाराजगी दूर करने के लिए शिवजी ने गणेश के धड़ पर हाथी का मस्तक लगा कर जीवनदान दे दिया। तभी से शिवजी ने उन्हें तमाम सामर्थ्य और शक्तियाँ प्रदान करते हुए प्रथम पूज्य और गणों का देव बनाया।
सबक गणेश के पास हाथी का सिर, मोटा पेट और चूहा जैसा छोटा वाहन है, लेकिन इन समस्याओं के बाद भी वे विघ्नविनाशक, संकटमोचक की उपाधियों से नवाजे गए हैं। कारण यह है कि उन्होंने अपनी कमियों को कभी अपना नकारात्मक पक्ष नहीं बनने दिया, बल्कि अपनी ताकत बनाया। उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सूंड बताती है कि सफलता का पथ सीधा नहीं है।
यहाँ दाएँ-बाएँ खोज करने पर ही सफलता और सच प्राप्त होगा। हाथी की भाँति चाल भले ही धीमी हो, लेकिन अपना पथ अपना लक्ष्य न भूलें। उनकी आँखें छोटी लेकिन पैनी है, यानी चीजों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करना चाहिए। कान बड़े है यानी एक अच्छे श्रोता का गुण हम सबमें हमेशा होना चाहिए।
श्री गणेशजी की आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ॥ जय...

एक दन्त दयावन्त चार भुजा धारी।
माथे सिन्दूर सोहे मूसे की सवारी ॥ जय...
अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥ जय...
हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा ॥ जय...
दीनन की लाज रखो, शम्भु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जाऊँ बलीहारी॥ जय...
आरती-2
सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मन कामनांपुरती॥ जय देव...
रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा।
हिरेजड़ित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरीया॥ जय देव...
लंबोदर पीतांबर फणीवर बंधना।
सरळ सोंड वक्रतुण्ड त्रिनयना।
दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकष्टी पावावें, निर्वाणी रक्षावे,
सुरवरवंदना॥ जय देव...
आरती-3
शेंदुर लाल चढ़ायो अच्छा गजमुखको।
दोंदिल लाल बिराजे सुत गौरिहरको।
हाथ लिए गुडलद्दु साँई सुरवरको।
महिमा कहे न जाय लागत हूँ पादको ॥1॥

जय जय जी गणराज विद्या सुखदाता।
धन्य तुम्हारा दर्शन मेरा मन रमता ॥धृ॥
अष्टौ सिद्धि दासी संकटको बैरि।
विघ्नविनाशन मंगल मूरत अधिकारी।
कोटीसूरजप्रकाश ऐबी छबि तेरी।
गंडस्थलमदमस्तक झूले शशिबिहारि ॥2॥
भावभगत से कोई शरणागत आवे।
संतत संपत सबही भरपूर पावे।
ऐसे तुम महाराज मोको अति भावे।
गोसावीनंदन निशिदिन गुन गावे ॥3॥
आरती-4
घालीन लोटांगण वंदीन चरण।
डोळ्यांनी पाहिन रूप तुझे ।
प्रेमें आलिंगीन आनंद पूजन।
भावे ओवाळिन म्हणे नामा॥

त्वमेव माता पिता त्वमेव।
त्वमेव बंधुः सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा।
बुध्यात्मना वा प्रकृति स्वभावत्।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै।
नारायणायेती समर्पयामि॥
अच्युतं केशवं राम नारायणम्।
कृष्णदामोदरं वासुदेवं भजे।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभम्।
जानकीनायकं रामचंद्रं भजे॥
आरती-5
जय गणेशाय नमः
प्रारंभी विनती करू गणपती विद्यादयासागरा।
अज्ञानत्व हरोनी बुद्धि मती दे आराध्य मोरेश्वरा
चिंता, क्लेश, दरिद्र दुःख अवघे,

देशांतरा पाठवी।
हेरंबा गणनायका गजमुखा भक्तां बहू तोषवीं॥
मंगलवार, 7 सितंबर 2010
भगवान गणेश
क्या दो देवता हैं गणेश और गणपति?
हिन्दू धर्म ग्रंथों में प्रसंग है कि भगवान शिव के विवाह में सबसे पहले गणपति की पूजा हुई थी। यह सुनकर मन में यह जानने कि उत्सुकता होती है कि जब भगवान गणेश शिव-पार्वती के पुत्र हैं तो उनके विवाह के पहले ही उनकी पूजा कैसे की गई। लोक मान्यताओं में भी गणेश और गणपति को एक देवता के रुप में जाना जाता है। किंतु धर्म ग्रंथ में गणेश और गणपति को अलग-अलग रुप के बारे में बताया गया हैं। जानते हैं अंतर को -

शास्त्रों के अनुसार गणेश का अर्थ है - जगत के सभी प्राणियों का ईश्वर या स्वामी। इसी तरह गणपति का मतलब होता है - गणों यानि देवताओं का मुखिया या रक्षक।
गणपति को शिव, विष्णु की तरह ही स्वयंभु, अजन्मा, अनादि और अनंत यानि जिनका न जन्म हुआ न ही अंत है, माना गया है।
श्री गणेश इन गणपति का ही अवतार हैं। जैसे पुराणों में विष्णु का अवतार राम, कृष्ण, नृसिंह का अवतार बताया गया है। वैसे ही गणपति, गणेश रुप में जन्में और अलग-अलग युगों में अलग-अलग रुपों में पूजित हुए। विनायक, मोरेश्वर, धूम्रकेतु, गजानन कृतयुग, त्रेतायुग में पूजित गणपति के ही रुप है। यही कारण है कि काल अन्तर से श्रीगणेश जन्म की भी अनेक कथाएं हैं।
सनातन धर्म में वैदिक काल से ही पांच देवों की पूजा लोकप्रिय है। इनमें गणपति पंच देवों में प्रमुख माने गए हैं। इन सब बातों में एक बात साफ है कि गणपति हो या गणेश वास्तव मे दोनों ही शक्ति का नाम है जो हर कार्य मे सिद्ध यानि कुशल और सफल बनाती है।
ऐसा रुप क्यों है गणेश का?
हर धार्मिक कर्म, पूजा, उपासना या शुभ और मंगल कार्यों में स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाता है। लोक भाषा में यह मंगल का प्रतीक है। लेकिन यहां जानते हैं कि वास्तव में शुभ कार्यों में स्वस्तिक बनाने का क्या कारण है -
दरअसल धार्मिक नजरिए से स्वस्तिक भगवान श्री गणेश का साकार रुप है। इसमें बाएं भाग में गं बीजमंत्र होता है, जो भगवान श्री गणेश का स्थान माना जाता है। इसकी आकृति में चार बिन्दियां भी बनाई जाती है। जिसमें गौरी, पृथ्वी, कूर्म यानि कछुआ और अनन्त देवताओं का वास माना जाता है।

स्वस्तिक के भगवान गणेश का रुप होने का प्रमाण दुनिया के सबसे पुराने ग्रंथ माने जाने वाले वेदों में आए शांति पाठ से भी होती है, जो हर हिन्दू धार्मिक रीति-रिवाजों में बोला जाता है। यह मंत्र है -
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:
स्वस्तिनस्ता रक्षो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पर्तिदधातु
इस मंत्र में चार बार स्वस्ति शब्द आता है। जिसका मतलब होता है कि इसमें भी चार बार मंगल और शुभ की कामना से श्री गणेश का ध्यान और आवाहन किया गया है।
इसमें व्यावहारिक जीवन का पक्ष खोजें तो पाते हैं कि जहां शुभ, मंगल और कल्याण का भाव होता है, वहीं स्वस्तिक का वास होता है सरल शब्दों में जहां परिवार, समाज या रिश्तों में प्यार, सुख, श्री, उमंग, उल्लास, सद्भाव, सुंदरता और विश्वास का भाव हो। वहीं सुख और सौभाग्य होता है। इसे ही जीवन पर श्री गणेश की कृपा माना जाता है यानि श्री गणेश वहीं बसते हैं। इसलिए श्रीगणेश को मंगलकारी देवता माना गया है।
लाईफ बना दे ऐसी गणेश पूजा
भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि (इस बार 11 सितंबर) श्री गणेश का जन्मदिन होने से गणपति उपासना का विशेष महत्व है। इस विनायकी चतुर्थी पर भगवान श्री गणेश की प्रसन्नता के पूरी आस्था और श्रद्धा से व्रत, उपवास, पूजा-अर्चना की जाती है। जानते हैं इसी गणेश पूजा की सरल विधि -

- प्रात:काल स्नान एवं नित्यकर्म करें।
- मध्यान्ह के समय शुभ मुहूर्त देखकर अपनी शक्ति के सोने, चांदी, तांबे, पीतल या मिट्टी से बनी भगवान गणेश की प्रतिमा घर, कार्यालय या देवालय में स्थापित करें।
- श्रीगणेश पूजा स्वयं या फिर किसी विद्वान ब्राह्मण से कराएं। जिसमें संकल्प मंत्र के बाद षोड़शोपचार पूजन-आरती करें। इस पूजन में भगवान श्री गणेश को सोलह प्रकार की पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इनमें धूप, दीप, गंध, पुष्प, अक्षत के साथ विशेष रुप से सिंदूर, दूर्वा, लाल चंदन जरुर चढ़ाना चाहिए।
- पूजा में तुलसी दल भगवान श्री गणेश को नहीं चढ़ाना चाहिए। यह शास्त्रों में वर्जित बताया गया है।
- गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं। गणेश मंत्र बोलते हुए 21 दुर्वा-दल चढ़ाएं।
ऊँ गणाधिपायनम:। ऊँ उमापुत्रायनम:।
ऊँ विघ्ननाशायनम:। ऊँ विनायकायनम:।
ऊँ ईशपुत्रायनम:। ऊँ सर्वसिद्धिप्रदायनम:।
ऊँ एकदन्तायनम:। ऊँ इभवक्त्रायनम:।
ऊँ मूषकवाहनायनम:। ऊँ कुमारगुरवेनम:।
- भगवान गणेश का मंत्र ओम गं गणपतये नम: बोलकर भी दुर्वा चढाएं। इस मंत्र का 108 बार जप भी करें।
- गुड़ या बूंदी के 21 लड्डुओं का ही भोग लगाना चाहिए। इनमें से 5 लड्डू मूर्ति के पास चढ़ाएं और 5 ब्राह्मण को दें। बाकी लड्डू प्रसाद रूप में बांट दें।
- पूजा में भगवान श्री गणेश स्त्रोत, अथर्वशीर्ष, संकटनाशक स्त्रोत आदि का पाठ करें। यह स्त्रोत इस साईट पर उपलब्ध है।
- ब्राह्मण भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा भेंट करने के बाद शाम के समय स्वयं भोजन ग्रहण कर सकते हैं। जहां तक संभव हो उपवास करें।
श्री गणेश की पूजा और आरती अगले दस दिनों तक पूरी श्रद्धा, भाव से करें। धार्मिक दृष्टि से श्री गणेश की ऐसी पूजा सभी भौतिक सुख, सफलता देने वाली होती है।
हिन्दू धर्म ग्रंथों में प्रसंग है कि भगवान शिव के विवाह में सबसे पहले गणपति की पूजा हुई थी। यह सुनकर मन में यह जानने कि उत्सुकता होती है कि जब भगवान गणेश शिव-पार्वती के पुत्र हैं तो उनके विवाह के पहले ही उनकी पूजा कैसे की गई। लोक मान्यताओं में भी गणेश और गणपति को एक देवता के रुप में जाना जाता है। किंतु धर्म ग्रंथ में गणेश और गणपति को अलग-अलग रुप के बारे में बताया गया हैं। जानते हैं अंतर को -

शास्त्रों के अनुसार गणेश का अर्थ है - जगत के सभी प्राणियों का ईश्वर या स्वामी। इसी तरह गणपति का मतलब होता है - गणों यानि देवताओं का मुखिया या रक्षक।
गणपति को शिव, विष्णु की तरह ही स्वयंभु, अजन्मा, अनादि और अनंत यानि जिनका न जन्म हुआ न ही अंत है, माना गया है।
श्री गणेश इन गणपति का ही अवतार हैं। जैसे पुराणों में विष्णु का अवतार राम, कृष्ण, नृसिंह का अवतार बताया गया है। वैसे ही गणपति, गणेश रुप में जन्में और अलग-अलग युगों में अलग-अलग रुपों में पूजित हुए। विनायक, मोरेश्वर, धूम्रकेतु, गजानन कृतयुग, त्रेतायुग में पूजित गणपति के ही रुप है। यही कारण है कि काल अन्तर से श्रीगणेश जन्म की भी अनेक कथाएं हैं।
सनातन धर्म में वैदिक काल से ही पांच देवों की पूजा लोकप्रिय है। इनमें गणपति पंच देवों में प्रमुख माने गए हैं। इन सब बातों में एक बात साफ है कि गणपति हो या गणेश वास्तव मे दोनों ही शक्ति का नाम है जो हर कार्य मे सिद्ध यानि कुशल और सफल बनाती है।
ऐसा रुप क्यों है गणेश का?
हर धार्मिक कर्म, पूजा, उपासना या शुभ और मंगल कार्यों में स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाता है। लोक भाषा में यह मंगल का प्रतीक है। लेकिन यहां जानते हैं कि वास्तव में शुभ कार्यों में स्वस्तिक बनाने का क्या कारण है -
दरअसल धार्मिक नजरिए से स्वस्तिक भगवान श्री गणेश का साकार रुप है। इसमें बाएं भाग में गं बीजमंत्र होता है, जो भगवान श्री गणेश का स्थान माना जाता है। इसकी आकृति में चार बिन्दियां भी बनाई जाती है। जिसमें गौरी, पृथ्वी, कूर्म यानि कछुआ और अनन्त देवताओं का वास माना जाता है।

स्वस्तिक के भगवान गणेश का रुप होने का प्रमाण दुनिया के सबसे पुराने ग्रंथ माने जाने वाले वेदों में आए शांति पाठ से भी होती है, जो हर हिन्दू धार्मिक रीति-रिवाजों में बोला जाता है। यह मंत्र है -
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:
स्वस्तिनस्ता रक्षो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पर्तिदधातु
इस मंत्र में चार बार स्वस्ति शब्द आता है। जिसका मतलब होता है कि इसमें भी चार बार मंगल और शुभ की कामना से श्री गणेश का ध्यान और आवाहन किया गया है।
इसमें व्यावहारिक जीवन का पक्ष खोजें तो पाते हैं कि जहां शुभ, मंगल और कल्याण का भाव होता है, वहीं स्वस्तिक का वास होता है सरल शब्दों में जहां परिवार, समाज या रिश्तों में प्यार, सुख, श्री, उमंग, उल्लास, सद्भाव, सुंदरता और विश्वास का भाव हो। वहीं सुख और सौभाग्य होता है। इसे ही जीवन पर श्री गणेश की कृपा माना जाता है यानि श्री गणेश वहीं बसते हैं। इसलिए श्रीगणेश को मंगलकारी देवता माना गया है।
लाईफ बना दे ऐसी गणेश पूजा
भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि (इस बार 11 सितंबर) श्री गणेश का जन्मदिन होने से गणपति उपासना का विशेष महत्व है। इस विनायकी चतुर्थी पर भगवान श्री गणेश की प्रसन्नता के पूरी आस्था और श्रद्धा से व्रत, उपवास, पूजा-अर्चना की जाती है। जानते हैं इसी गणेश पूजा की सरल विधि -

- प्रात:काल स्नान एवं नित्यकर्म करें।
- मध्यान्ह के समय शुभ मुहूर्त देखकर अपनी शक्ति के सोने, चांदी, तांबे, पीतल या मिट्टी से बनी भगवान गणेश की प्रतिमा घर, कार्यालय या देवालय में स्थापित करें।
- श्रीगणेश पूजा स्वयं या फिर किसी विद्वान ब्राह्मण से कराएं। जिसमें संकल्प मंत्र के बाद षोड़शोपचार पूजन-आरती करें। इस पूजन में भगवान श्री गणेश को सोलह प्रकार की पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इनमें धूप, दीप, गंध, पुष्प, अक्षत के साथ विशेष रुप से सिंदूर, दूर्वा, लाल चंदन जरुर चढ़ाना चाहिए।
- पूजा में तुलसी दल भगवान श्री गणेश को नहीं चढ़ाना चाहिए। यह शास्त्रों में वर्जित बताया गया है।
- गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं। गणेश मंत्र बोलते हुए 21 दुर्वा-दल चढ़ाएं।
ऊँ गणाधिपायनम:। ऊँ उमापुत्रायनम:।
ऊँ विघ्ननाशायनम:। ऊँ विनायकायनम:।
ऊँ ईशपुत्रायनम:। ऊँ सर्वसिद्धिप्रदायनम:।
ऊँ एकदन्तायनम:। ऊँ इभवक्त्रायनम:।
ऊँ मूषकवाहनायनम:। ऊँ कुमारगुरवेनम:।
- भगवान गणेश का मंत्र ओम गं गणपतये नम: बोलकर भी दुर्वा चढाएं। इस मंत्र का 108 बार जप भी करें।
- गुड़ या बूंदी के 21 लड्डुओं का ही भोग लगाना चाहिए। इनमें से 5 लड्डू मूर्ति के पास चढ़ाएं और 5 ब्राह्मण को दें। बाकी लड्डू प्रसाद रूप में बांट दें।
- पूजा में भगवान श्री गणेश स्त्रोत, अथर्वशीर्ष, संकटनाशक स्त्रोत आदि का पाठ करें। यह स्त्रोत इस साईट पर उपलब्ध है।
- ब्राह्मण भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा भेंट करने के बाद शाम के समय स्वयं भोजन ग्रहण कर सकते हैं। जहां तक संभव हो उपवास करें।
श्री गणेश की पूजा और आरती अगले दस दिनों तक पूरी श्रद्धा, भाव से करें। धार्मिक दृष्टि से श्री गणेश की ऐसी पूजा सभी भौतिक सुख, सफलता देने वाली होती है।
सोमवार, 23 अगस्त 2010
रक्षा बंधन
रक्षा बंधन भाई बहन के रिश्ते की अलार्म क्लॉक
रक्षाबंधन का यह पर्व आज पूरी दुनिया में मशहूर है। बाजार भी कई तरह के उपहारों से भरा पड़ा है। राखियां भी कई तरह के रंगबिरंगे रंगों से दुकानों में बंदनवार जैसे सजी हुई हैं। बहनें राखी तलाश रही हैं और भाई उपहार खोज रहे हैं। पर एक महत्वपूर्ण चीज जिसे खोजा जाना चाहिए था वह कोई नहीं खोज रहा जबकि असल में वही ज़रूरी है और वह ज़रूरी चीज़ है विश्वास और प्रेम। हम मंहगी राखियों और कीमती उपहारों से ज्यादा कुछ नहीं सोच रहे क्योंकि यह ही हमारे दिमाग में हावी हैं।

विश्वास और प्रेम होता तो क्या कोई भाई अपनी बहन और उसके जीवनसाथी की जान ले सकता था? इज्जत के नाम पर हत्या का जो खेल लगातार चल रहा है वह थम न गया होता? क्या इन भाइयों की कलाई पर राखी नहीं सजी होगी या फिर इन्होंने कीमती उपहार नहीं दिए? सब कुछ हुआ पर विश्वास और प्रेम का रिश्ता न बन सका। रक्षाबंधन का दिन इसी विश्वास और प्रेम को कायम रखने के लिए मनाया जाता है एक तरह से यह भाई-बहन के रिश्ते की अलार्म क्लॉक है। ताकि रिश्ते हमेशा सजग रहें।
धर्म और जाति से परे है रक्षाबंधन
रक्षा बंधन का पर्व भाई और बहन के रिश्ते की डोर में बंधा सुरक्षा कवच है। यह रिश्ता धर्म की सीमाओं से भी परे है। इतिहास गवाह है कि हिंदू,मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन, पारसी जैसे अलग-अलग धर्मों के बीच भी भाई और बहन के रिश्तों ने जन्म लिया और पूरे जीवनभर निभाया।
दूर-दूर तक फैली है रिश्तों की डोर
यह रिश्ता एक ही कोख से जन्म लेने वाले भाई- बहन के बीच जितना लोकप्रिय है उतना ही लोकप्रिय अंतरजातीय, अंतरदेशीय भाई बहन के बीच भी है। बहुत सारे अंचल ऐसे भी हैं जहां यह रिश्ते परस्पर फूल और मिठाई देकर तय होते हैं और इसे फूल पताना या सहया बनाना कहते हैं फूल माँ, फूल बाबा, फूल भाई, फूल बहन। झारखंड में इस तरह के रिश्तों का रिवाज है और यह रिश्ते हर पीढ़ी को निभाने होते हैं और लोग बहुत प्रेम के साथ यह रिश्ते निभाते हैं। फूल मां और फूल बहन के रिश्ते ऐसे गांवों में ज्यादा हैं,जहां अलग -अलग जातियों के लोग रहते हैं। रक्षाबंधन से लेकर शादी तक में रस्में निभाई जाती हैं। इस तरह से रिश्तों की यह बनावट हमारे समाज को मजबूत करती है और सांस्कृतिक विकास भी करती हैं।
फिल्मों से लेकर सीरियल तक में है रक्षाबंधन का त्योहार
इस थीम पर बनी फिल्में भी सुपरहिट रही। इन फिल्मों के गाने आज भी रक्षाबंधन के दिन एफएम से लेकर टीवी तक में देखे सुने जा सकते हैं। समय के साथ यह गाने अन्य गानों की तरह बासी नहीं हुए बल्कि आज भी इन गानों को सुनकर रिश्तों की मिठास का अनुभव होता है। इसकी वजह साफ हैं क्योंकि भाई-बहन के रिश्ते में किसी तीसरे की घुसपैठ की संभावना नहीं रहती। टीवी सीरियलों में भी भाई -बहन की जोड़ी यह त्योहार मनाती है।
भाई-बहन की जोड़ी आदर्श
परिवार की पूर्णता के लिए अभी भी भाई-बहन की जोड़ी आदर्श मानी जाती है। पहली बेटी है तो अभी भी लोग आर्शीवाद देते समय कहते हैं अब तो भाई आना चाहिए। कहने का अर्थ यह है कि भाई और बहन की जोड़ी समाज में परिवार की संपूर्णता के रूप में देखी जाती है। राखी के दिन बहन भी अपने भाई को उपहार
देती है।
मौन भी हो जाते हैं रिश्ते
आज से कुछ समय पहले रिश्तों में एक अजीब सा ठहराव आ गया था। मन की दूरियां भी बढ़ने लगी थी इसकी वजह यह थी कि आपस में संवाद नहीं हो पाता था। संवाद के साधनों में सिर्फ डाक सेवा थी टेलीफोन भी सबके घरों में नहीं थे। चिट्ठी में कितना लिख सकते हैं और उसके पहुंचने में भी समय लगता था। फिर भी उसका आसरा था। घर से दूर गया भाई एक ही चिट्ठी में सबको लिखता था। पर्सनल स्पेस कम था। पढ़ाई-लिखाई के लिए या फिर नौकरी के लिए निकला भाई काम में इतना व्यस्त हो जाता था कि उसे फुर्सत ही नहीं मिल पाती थी । यही वजह थी कि रिश्तों में दूरियां थी।
तकनीक ने दिए रिश्तों को बोल
उदारीकरण के बाद बदलाव आया। नई तकनीकि का विकास जोर शोर से शुरू हुआ लोगों के पास पैसा भी आया । हर किसी के घर में फोन में घंटियां बजने लगीं। इतना ही नहीं मोबाइल भी लोगों के हाथ में दिखाई देने लगे। शुरू में यह बहुत मंहगे थे पर धीरे-धीरे यह सस्ते हो गए और हर किसी के हाथ में आ गए। इसी के साथ कंप्यूटर की दुनिया में भी सभी का दखल होने लगा। छोटे से लेकर बड़े शहरों में कंप्यूटर सिखाने वाले इंस्टीटय़ूट दिखाई देने लगे और इस तरह संवाद के रास्ते भी खुल गए। रिश्ते मन के और करीब आ गए। फेस बुक, ट्विटर, ई-मेल ने रिश्तों का विकास किया।
बहनें करती हैं भाइयों के सपने पूरे
बहुत बार जिंदगी में ऐसे भी मोड़ आते हैं,जो असहनीय होते हैं रिश्तों की डोर टूट जाती है। काम अधूरे रह जाते हैं। ऐसे में बहनें अपने भाई के द्वारा शुरू किए गए कार्यों को मंजिल तक पहुंचाती हैं। वह डॉक्टर बनती है, आईएएस बनती है। पर हर हाल में भाई का सपना पूरा करती हैं।
बहनें बहनें भी बांधती हैं राखियां
अपने ही बारे में बताती हूं। हम दो बहनें है। भाई की मृत्यु एक्सीडेंट से हो गई। एक्सीडेंट के बाद जब उसे अस्पताल ले जाया गया डॉक्टर ने केस हेंडिल करने में काफी समय लगा दिया। इससे उसका काफी खून बह गया और वह बच नहीं सका। मेरी दीदी तब बहुत ही छोटी थी और उसके लिए यह एक ऐसा घाव था जो कभी नहीं भर सकता था। उसके दिमाग में यह बात बैठ गई कि अगर डॉक्टर ने समय रहते उसे देख लिया होता तो मेरा भाई जिंदा रहता। उस छोटी सी बच्चाी ने उसी दिन खुद से वादा किया कि मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनूंगी और मरीजों की सेवा करूंगी। आज वह डॉक्टर है और मरीजो ं की सेवा में जी-जान से जुटी है। मैं अपनी इसी दीदी को राखी बांधती हूं। क्योंकि मेरे लिए तो भाई भी वही है और दीदी भी।
मुनाफा नहीं है रिश्ता
भाई-बहन का रिश्ता मुनाफा नहीं है। रक्षाबंधन का पर्व प्रेम और सद्भावना का है पर हमने इसे मुनाफे से जोड़ दिया है। राखी के गिफ्ट ज्यादा पापुलर हो रहे हैं। और यह गिफ्ट भी काफी मंहगें हैं। रिश्तों में बाजार इस कदर हावी है कि रिश्ते का अर्थ उपहार की कीमत से देखा जा रहा है। बहनों को भी सोसायटी फोबिया है और वह भाई के उपहार को अपना स्टेटस सिंबल बना रही हैं। भाई की कुशल क्षेम पूछने के बजाए दोस्तों को इस बात को जानने की इच्छा होती है कि गिफ्ट क्या मिला? बहन की खुशी गिफ्ट के डिब्बे में कैद हो गई हैं। बाजार महिला के इसी मनोविज्ञान को भुना रहा है और काफी हद तक सफल भी है।
रक्षाबंधन का यह पर्व आज पूरी दुनिया में मशहूर है। बाजार भी कई तरह के उपहारों से भरा पड़ा है। राखियां भी कई तरह के रंगबिरंगे रंगों से दुकानों में बंदनवार जैसे सजी हुई हैं। बहनें राखी तलाश रही हैं और भाई उपहार खोज रहे हैं। पर एक महत्वपूर्ण चीज जिसे खोजा जाना चाहिए था वह कोई नहीं खोज रहा जबकि असल में वही ज़रूरी है और वह ज़रूरी चीज़ है विश्वास और प्रेम। हम मंहगी राखियों और कीमती उपहारों से ज्यादा कुछ नहीं सोच रहे क्योंकि यह ही हमारे दिमाग में हावी हैं।

विश्वास और प्रेम होता तो क्या कोई भाई अपनी बहन और उसके जीवनसाथी की जान ले सकता था? इज्जत के नाम पर हत्या का जो खेल लगातार चल रहा है वह थम न गया होता? क्या इन भाइयों की कलाई पर राखी नहीं सजी होगी या फिर इन्होंने कीमती उपहार नहीं दिए? सब कुछ हुआ पर विश्वास और प्रेम का रिश्ता न बन सका। रक्षाबंधन का दिन इसी विश्वास और प्रेम को कायम रखने के लिए मनाया जाता है एक तरह से यह भाई-बहन के रिश्ते की अलार्म क्लॉक है। ताकि रिश्ते हमेशा सजग रहें।
धर्म और जाति से परे है रक्षाबंधन
रक्षा बंधन का पर्व भाई और बहन के रिश्ते की डोर में बंधा सुरक्षा कवच है। यह रिश्ता धर्म की सीमाओं से भी परे है। इतिहास गवाह है कि हिंदू,मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन, पारसी जैसे अलग-अलग धर्मों के बीच भी भाई और बहन के रिश्तों ने जन्म लिया और पूरे जीवनभर निभाया।
दूर-दूर तक फैली है रिश्तों की डोर
यह रिश्ता एक ही कोख से जन्म लेने वाले भाई- बहन के बीच जितना लोकप्रिय है उतना ही लोकप्रिय अंतरजातीय, अंतरदेशीय भाई बहन के बीच भी है। बहुत सारे अंचल ऐसे भी हैं जहां यह रिश्ते परस्पर फूल और मिठाई देकर तय होते हैं और इसे फूल पताना या सहया बनाना कहते हैं फूल माँ, फूल बाबा, फूल भाई, फूल बहन। झारखंड में इस तरह के रिश्तों का रिवाज है और यह रिश्ते हर पीढ़ी को निभाने होते हैं और लोग बहुत प्रेम के साथ यह रिश्ते निभाते हैं। फूल मां और फूल बहन के रिश्ते ऐसे गांवों में ज्यादा हैं,जहां अलग -अलग जातियों के लोग रहते हैं। रक्षाबंधन से लेकर शादी तक में रस्में निभाई जाती हैं। इस तरह से रिश्तों की यह बनावट हमारे समाज को मजबूत करती है और सांस्कृतिक विकास भी करती हैं।
फिल्मों से लेकर सीरियल तक में है रक्षाबंधन का त्योहार
इस थीम पर बनी फिल्में भी सुपरहिट रही। इन फिल्मों के गाने आज भी रक्षाबंधन के दिन एफएम से लेकर टीवी तक में देखे सुने जा सकते हैं। समय के साथ यह गाने अन्य गानों की तरह बासी नहीं हुए बल्कि आज भी इन गानों को सुनकर रिश्तों की मिठास का अनुभव होता है। इसकी वजह साफ हैं क्योंकि भाई-बहन के रिश्ते में किसी तीसरे की घुसपैठ की संभावना नहीं रहती। टीवी सीरियलों में भी भाई -बहन की जोड़ी यह त्योहार मनाती है।
भाई-बहन की जोड़ी आदर्श
परिवार की पूर्णता के लिए अभी भी भाई-बहन की जोड़ी आदर्श मानी जाती है। पहली बेटी है तो अभी भी लोग आर्शीवाद देते समय कहते हैं अब तो भाई आना चाहिए। कहने का अर्थ यह है कि भाई और बहन की जोड़ी समाज में परिवार की संपूर्णता के रूप में देखी जाती है। राखी के दिन बहन भी अपने भाई को उपहार
देती है।
मौन भी हो जाते हैं रिश्ते
आज से कुछ समय पहले रिश्तों में एक अजीब सा ठहराव आ गया था। मन की दूरियां भी बढ़ने लगी थी इसकी वजह यह थी कि आपस में संवाद नहीं हो पाता था। संवाद के साधनों में सिर्फ डाक सेवा थी टेलीफोन भी सबके घरों में नहीं थे। चिट्ठी में कितना लिख सकते हैं और उसके पहुंचने में भी समय लगता था। फिर भी उसका आसरा था। घर से दूर गया भाई एक ही चिट्ठी में सबको लिखता था। पर्सनल स्पेस कम था। पढ़ाई-लिखाई के लिए या फिर नौकरी के लिए निकला भाई काम में इतना व्यस्त हो जाता था कि उसे फुर्सत ही नहीं मिल पाती थी । यही वजह थी कि रिश्तों में दूरियां थी।
तकनीक ने दिए रिश्तों को बोल
उदारीकरण के बाद बदलाव आया। नई तकनीकि का विकास जोर शोर से शुरू हुआ लोगों के पास पैसा भी आया । हर किसी के घर में फोन में घंटियां बजने लगीं। इतना ही नहीं मोबाइल भी लोगों के हाथ में दिखाई देने लगे। शुरू में यह बहुत मंहगे थे पर धीरे-धीरे यह सस्ते हो गए और हर किसी के हाथ में आ गए। इसी के साथ कंप्यूटर की दुनिया में भी सभी का दखल होने लगा। छोटे से लेकर बड़े शहरों में कंप्यूटर सिखाने वाले इंस्टीटय़ूट दिखाई देने लगे और इस तरह संवाद के रास्ते भी खुल गए। रिश्ते मन के और करीब आ गए। फेस बुक, ट्विटर, ई-मेल ने रिश्तों का विकास किया।
बहनें करती हैं भाइयों के सपने पूरे
बहुत बार जिंदगी में ऐसे भी मोड़ आते हैं,जो असहनीय होते हैं रिश्तों की डोर टूट जाती है। काम अधूरे रह जाते हैं। ऐसे में बहनें अपने भाई के द्वारा शुरू किए गए कार्यों को मंजिल तक पहुंचाती हैं। वह डॉक्टर बनती है, आईएएस बनती है। पर हर हाल में भाई का सपना पूरा करती हैं।
बहनें बहनें भी बांधती हैं राखियां
अपने ही बारे में बताती हूं। हम दो बहनें है। भाई की मृत्यु एक्सीडेंट से हो गई। एक्सीडेंट के बाद जब उसे अस्पताल ले जाया गया डॉक्टर ने केस हेंडिल करने में काफी समय लगा दिया। इससे उसका काफी खून बह गया और वह बच नहीं सका। मेरी दीदी तब बहुत ही छोटी थी और उसके लिए यह एक ऐसा घाव था जो कभी नहीं भर सकता था। उसके दिमाग में यह बात बैठ गई कि अगर डॉक्टर ने समय रहते उसे देख लिया होता तो मेरा भाई जिंदा रहता। उस छोटी सी बच्चाी ने उसी दिन खुद से वादा किया कि मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनूंगी और मरीजों की सेवा करूंगी। आज वह डॉक्टर है और मरीजो ं की सेवा में जी-जान से जुटी है। मैं अपनी इसी दीदी को राखी बांधती हूं। क्योंकि मेरे लिए तो भाई भी वही है और दीदी भी।
मुनाफा नहीं है रिश्ता
भाई-बहन का रिश्ता मुनाफा नहीं है। रक्षाबंधन का पर्व प्रेम और सद्भावना का है पर हमने इसे मुनाफे से जोड़ दिया है। राखी के गिफ्ट ज्यादा पापुलर हो रहे हैं। और यह गिफ्ट भी काफी मंहगें हैं। रिश्तों में बाजार इस कदर हावी है कि रिश्ते का अर्थ उपहार की कीमत से देखा जा रहा है। बहनों को भी सोसायटी फोबिया है और वह भाई के उपहार को अपना स्टेटस सिंबल बना रही हैं। भाई की कुशल क्षेम पूछने के बजाए दोस्तों को इस बात को जानने की इच्छा होती है कि गिफ्ट क्या मिला? बहन की खुशी गिफ्ट के डिब्बे में कैद हो गई हैं। बाजार महिला के इसी मनोविज्ञान को भुना रहा है और काफी हद तक सफल भी है।
एहसान
काबिले-ग़ौर है अंग्रेजी का औरतों पर एहसान
जाहिदा हिना
दा पुरानी नहीं, बस सदी-सवा सदी पुरानी बात है, जब हमारे उपमहाद्वीप में क्या हिंदू, क्या मुस्लिम दोनों ही समाजों में लड़कियों की शिक्षा को बहुत बुरा समझा जाता था। कुछ लोगों का ख़्याल था कि लड़कियां पढ़-लिख कर बिगड़ जाएंगी।
अंग्रेजी राज से लाख शिकायतों के बावजूद, हमारे उपमहाद्वीप की हिंदू और मुस्लिम औरतों पर उनका एहसान है कि उन्होंने उनकी तालीम पर जार दिया। 1787 में मद्रास के गवर्नर की बीवी लेडी कैंबल ने हिंदुस्तानी लड़कियों के लिए पहला स्कूल शुरू किया और फिर यह बात इतनी आगे बढ़ी कि राजा राममोहन राय, शेख़ अब्दुल्ला, मौलवी मुमताज अली और दूसरे कई लोगों ने लड़कियों की शिक्षा को फैलाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
उस समय क्या हिंदू और क्या मुस्लिम दोनों ही तरफ़ के रूढ़िवादी लोगों की ओर से यह कहा जाता था कि लड़कियों की अंग्रेजी शिक्षा एक बुराई है, जो अंग्रेजी ने फैलाई है और जिसका मक़सद दोनों समाजों की लड़कियों का धर्म भ्रष्ट करना है। यह बुराई हमारे समाज में इस तेजी से फैली कि देखते ही देखते सिर्फ़ साहित्य के ही क्षेत्र में रुकैया सख़ावत हसमैन, सरोजिनी नायडू, शाइस्ता इकराम उल्लाह, कुर्रतुलऐन हैदर और आज की नस्ल की अरुंधति राय जैसी मशहूर लेखिकाएं पैदा हुईं, जिनका अंग्रेजी दुनिया में भी नाम है।
एक तरफ़ उपमहाद्वीप की औरतों की साहित्य के क्षेत्र में यह सफलता, दूसरी तरफ़ सियासत है, तो इसमें विजय-लक्ष्मी पंडित, इंदिरा गांधी, मिसेज बेनÊाीर भुट्टो के नाम सारी दुनिया में मशहूर हैं। इस व़क्त पाकिस्तान और हिंदुस्तान दोनों मुल्कों की स्पीकर महिलाएं ही हैं।
इन सब बातों को देखते हुए इन उग्रवादियों और दहशतगर्दी पर हैरत होती है, जो पिछले आठ-दस वर्षो से पाकिस्तानी लड़कियों की तालीम के पीछे पड़े हुए हैं। स्वात, पेशावर और कई स्थानों पर अब तक लड़कियों के छह-सात सौ स्कूल बमों से उड़ाए जा चुके हैं या जला कर राख किए जा चुके हैं। बाज इलाकों में लोगों ने लड़कियों के स्कूल दोबारा बनाए, तो उन्हें फिर से तबाह कर दिया गया। बहुत से इलाक़ों से पढ़ने वाली औरतों के घरों पर ख़त भेजे गए कि अगर उन्होंने घर से बाहर क़दम निकाला, तो क़त्ल कर दिया जाएगा, उनके चेहरों पर तेजाब फेंक दिया जाएगा। और ऐसा करके दिखाया भी। इसके बावजूद पाकिस्तानी लड़कियां पढ़ रही हैं, पाकिस्तानी औरतें पढ़ रही हैं।
जहां स्कूल दोबारा से नहीं बनाए जा सके, वहां खेमों (तंबू) में कई बड़े घरों में या खुले आसमान के नीचे पढ़ने-पढ़ाने का सिलसिला जारी है। पाकिस्तानी लड़कियों में तालीम के शौक़ का अंदाÊा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज से नहीं साल दर साल से स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में टॉप करती हैं, गोल्ड मैडल और छात्रवृत्तियां लेती हैं, जबकि उनमें से 90 प्रतिशत लड़कियां घर के काम भी करती हैं और उन्हें ऐसी बहुत सी सुविधाएं हासिल नहीं हैं, जो हमारे यहां आमतौर पर, लड़कों को उनका हक़ समझ कर दी जाती हैं।
चंद ह़फ्तों पहले कराची में मैट्रिक साइंस का रिजल्ट आया है। इस इम्तिहान में 68 हजार लड़कों और 53 हजार लड़कियों ने हिस्सा लिया था। इनमें टॉप करने वाली तीनों लड़कियां थीं। 6500 लड़कियों ने ए-1 ग्रेड लिया है, जबकि ए ग्रेड लेने वाले लड़कों की तादाद 4000 थी। मैट्रिक ह्यूमनिटीज का रिजल्ट भी आया है। इसमें भी लड़कियों का प्रदर्शन लड़कों से बेहतर रहा है। इसी तरह लाहौर ग्राम स्कूल की लड़कियों ने नासा से जुड़े जॉनसन स्पेस सेंटर की तरफ़ से होने वाले मुक़ाबले में हिस्सा लिया।
यह मुक़ाबला अंतरिक्ष में इंसानी बस्तियां बनाने की डिजाइन बनाने का था और इस मुक़ाबले में क्वालिफाई करने के लिए हिंदुस्तान में एशियन रीजनल मुक़ाबला हुआ था। जनवरी 2010 में हिंदुस्तान के शहर गुड़गांव में एशिया की 33 टीमों ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया था, जिनमें से 15 टीमें हिंदुस्तान और पाकिस्तान की थीं। इसका वर्णन बहुत विस्तृत है, इसीलिए इसमें जाने की बजाय मैं आपको यह बताना चाहती हूं कि इसमें पाकिस्तानी लड़कियों ने कामयाबी हासिल की और उनके बनाई हुई डिजाइन विशेष रूप से स्वीकृत किए गए।
इससे आप पाकिस्तानी लड़कियों और औरतों में तालीम के साथ-साथ साइंस और टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में आगे बढ़ने की ख्वाहिश का अंदाज लगा सकते हैं। उधर, लोग अभी कराची से इस्लामाबाद जाने वाली एयर बस के क्रैश का ही शोक माना रहे थे कि इस हादसे के बारे में दर्जनों अफ़वाहों का बाजार गर्म था कि हमारे दरिया गजबनाक हो कर उबल पड़े, बाढ़ हर साल आती है। इससे तबाही भी होती है, लेकिन इस रिकॉर्ड के साथ ही बहुत से बांध भी टूट गए, सैकड़ों, देहात और दर्जनों बड़े क़स्बों और छोटे शहरों को पानी अपने साथ बहा कर ले गया।
सरकार यह कहती है कि अब तक बाढ़ से 25 लाख लोग बेघर हो चुके हैं। दो हजार से Êयादा लोगों की मौत हो चुकी है। लोग कहते हैं कि मरने और बेघर होने वालों की सही तादाद इससे कहीं जयादा है। आफ़त ने पिछले सात दिनों से कराची को घेर लिया है, शहर में बलवाई गोलियां बरसते घूम रहे हैं। प्रोविंशियल एसेंबली के एक मेंबर के क़त्ल के बाद पिछले दिनों में 50 लोग मार दिए गए। पब्लिक ट्रांसपोर्ट सड़कों से ग़ायब हैं। मैं जहां रहती हूं, वहां बलवे का इतना जार है कि इन फ्लैटों के दरवाजे पर लोग मारे गए और दो रातों से सिर्फ़ गोलियां चलने की आवाजे सुनाई दे रही हैं।
ई-1, जुनैद प्लाजा, राशिद मिन्हास रोड, गुलशन-ए-इक़बाल, ब्लॉक-6, कराची-75300 (पाकिस्तान)
जाहिदा हिना
दा पुरानी नहीं, बस सदी-सवा सदी पुरानी बात है, जब हमारे उपमहाद्वीप में क्या हिंदू, क्या मुस्लिम दोनों ही समाजों में लड़कियों की शिक्षा को बहुत बुरा समझा जाता था। कुछ लोगों का ख़्याल था कि लड़कियां पढ़-लिख कर बिगड़ जाएंगी।
अंग्रेजी राज से लाख शिकायतों के बावजूद, हमारे उपमहाद्वीप की हिंदू और मुस्लिम औरतों पर उनका एहसान है कि उन्होंने उनकी तालीम पर जार दिया। 1787 में मद्रास के गवर्नर की बीवी लेडी कैंबल ने हिंदुस्तानी लड़कियों के लिए पहला स्कूल शुरू किया और फिर यह बात इतनी आगे बढ़ी कि राजा राममोहन राय, शेख़ अब्दुल्ला, मौलवी मुमताज अली और दूसरे कई लोगों ने लड़कियों की शिक्षा को फैलाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
उस समय क्या हिंदू और क्या मुस्लिम दोनों ही तरफ़ के रूढ़िवादी लोगों की ओर से यह कहा जाता था कि लड़कियों की अंग्रेजी शिक्षा एक बुराई है, जो अंग्रेजी ने फैलाई है और जिसका मक़सद दोनों समाजों की लड़कियों का धर्म भ्रष्ट करना है। यह बुराई हमारे समाज में इस तेजी से फैली कि देखते ही देखते सिर्फ़ साहित्य के ही क्षेत्र में रुकैया सख़ावत हसमैन, सरोजिनी नायडू, शाइस्ता इकराम उल्लाह, कुर्रतुलऐन हैदर और आज की नस्ल की अरुंधति राय जैसी मशहूर लेखिकाएं पैदा हुईं, जिनका अंग्रेजी दुनिया में भी नाम है।
एक तरफ़ उपमहाद्वीप की औरतों की साहित्य के क्षेत्र में यह सफलता, दूसरी तरफ़ सियासत है, तो इसमें विजय-लक्ष्मी पंडित, इंदिरा गांधी, मिसेज बेनÊाीर भुट्टो के नाम सारी दुनिया में मशहूर हैं। इस व़क्त पाकिस्तान और हिंदुस्तान दोनों मुल्कों की स्पीकर महिलाएं ही हैं।
इन सब बातों को देखते हुए इन उग्रवादियों और दहशतगर्दी पर हैरत होती है, जो पिछले आठ-दस वर्षो से पाकिस्तानी लड़कियों की तालीम के पीछे पड़े हुए हैं। स्वात, पेशावर और कई स्थानों पर अब तक लड़कियों के छह-सात सौ स्कूल बमों से उड़ाए जा चुके हैं या जला कर राख किए जा चुके हैं। बाज इलाकों में लोगों ने लड़कियों के स्कूल दोबारा बनाए, तो उन्हें फिर से तबाह कर दिया गया। बहुत से इलाक़ों से पढ़ने वाली औरतों के घरों पर ख़त भेजे गए कि अगर उन्होंने घर से बाहर क़दम निकाला, तो क़त्ल कर दिया जाएगा, उनके चेहरों पर तेजाब फेंक दिया जाएगा। और ऐसा करके दिखाया भी। इसके बावजूद पाकिस्तानी लड़कियां पढ़ रही हैं, पाकिस्तानी औरतें पढ़ रही हैं।
जहां स्कूल दोबारा से नहीं बनाए जा सके, वहां खेमों (तंबू) में कई बड़े घरों में या खुले आसमान के नीचे पढ़ने-पढ़ाने का सिलसिला जारी है। पाकिस्तानी लड़कियों में तालीम के शौक़ का अंदाÊा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज से नहीं साल दर साल से स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में टॉप करती हैं, गोल्ड मैडल और छात्रवृत्तियां लेती हैं, जबकि उनमें से 90 प्रतिशत लड़कियां घर के काम भी करती हैं और उन्हें ऐसी बहुत सी सुविधाएं हासिल नहीं हैं, जो हमारे यहां आमतौर पर, लड़कों को उनका हक़ समझ कर दी जाती हैं।
चंद ह़फ्तों पहले कराची में मैट्रिक साइंस का रिजल्ट आया है। इस इम्तिहान में 68 हजार लड़कों और 53 हजार लड़कियों ने हिस्सा लिया था। इनमें टॉप करने वाली तीनों लड़कियां थीं। 6500 लड़कियों ने ए-1 ग्रेड लिया है, जबकि ए ग्रेड लेने वाले लड़कों की तादाद 4000 थी। मैट्रिक ह्यूमनिटीज का रिजल्ट भी आया है। इसमें भी लड़कियों का प्रदर्शन लड़कों से बेहतर रहा है। इसी तरह लाहौर ग्राम स्कूल की लड़कियों ने नासा से जुड़े जॉनसन स्पेस सेंटर की तरफ़ से होने वाले मुक़ाबले में हिस्सा लिया।
यह मुक़ाबला अंतरिक्ष में इंसानी बस्तियां बनाने की डिजाइन बनाने का था और इस मुक़ाबले में क्वालिफाई करने के लिए हिंदुस्तान में एशियन रीजनल मुक़ाबला हुआ था। जनवरी 2010 में हिंदुस्तान के शहर गुड़गांव में एशिया की 33 टीमों ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया था, जिनमें से 15 टीमें हिंदुस्तान और पाकिस्तान की थीं। इसका वर्णन बहुत विस्तृत है, इसीलिए इसमें जाने की बजाय मैं आपको यह बताना चाहती हूं कि इसमें पाकिस्तानी लड़कियों ने कामयाबी हासिल की और उनके बनाई हुई डिजाइन विशेष रूप से स्वीकृत किए गए।
इससे आप पाकिस्तानी लड़कियों और औरतों में तालीम के साथ-साथ साइंस और टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में आगे बढ़ने की ख्वाहिश का अंदाज लगा सकते हैं। उधर, लोग अभी कराची से इस्लामाबाद जाने वाली एयर बस के क्रैश का ही शोक माना रहे थे कि इस हादसे के बारे में दर्जनों अफ़वाहों का बाजार गर्म था कि हमारे दरिया गजबनाक हो कर उबल पड़े, बाढ़ हर साल आती है। इससे तबाही भी होती है, लेकिन इस रिकॉर्ड के साथ ही बहुत से बांध भी टूट गए, सैकड़ों, देहात और दर्जनों बड़े क़स्बों और छोटे शहरों को पानी अपने साथ बहा कर ले गया।
सरकार यह कहती है कि अब तक बाढ़ से 25 लाख लोग बेघर हो चुके हैं। दो हजार से Êयादा लोगों की मौत हो चुकी है। लोग कहते हैं कि मरने और बेघर होने वालों की सही तादाद इससे कहीं जयादा है। आफ़त ने पिछले सात दिनों से कराची को घेर लिया है, शहर में बलवाई गोलियां बरसते घूम रहे हैं। प्रोविंशियल एसेंबली के एक मेंबर के क़त्ल के बाद पिछले दिनों में 50 लोग मार दिए गए। पब्लिक ट्रांसपोर्ट सड़कों से ग़ायब हैं। मैं जहां रहती हूं, वहां बलवे का इतना जार है कि इन फ्लैटों के दरवाजे पर लोग मारे गए और दो रातों से सिर्फ़ गोलियां चलने की आवाजे सुनाई दे रही हैं।
ई-1, जुनैद प्लाजा, राशिद मिन्हास रोड, गुलशन-ए-इक़बाल, ब्लॉक-6, कराची-75300 (पाकिस्तान)
सोमवार, 5 जुलाई 2010
प्रेरक व्यक्तित्व
हँसते-हँसते फाँसी चढ़ गए बांठिया
भारत को आजादी यूँ ही नहीं मिली। इसके लिए कई लोगों ने अपनी कुरबानी दी थी, तब जाकर हिन्दुस्तान स्वतंत्र हुआ। इन महानायकों की अपनी विशेष भूमिका रही। ग्वालियर के ऐसे ही महानायक शहीद अमरचंद बांठिया ने अपना जीवन मातृभूमि के नाम समर्पित करते हुए हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को अपने गले से लगा लिया। २२ जून को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर कई कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं, पर जरूरत है इन कार्यक्रमों के साथ-साथ उन्हें सच्चे दिल से याद करने की।
कौन थे शहीद बांठिया
राजस्थान की राजपूतानी शौर्य भूमि में बीकानेर में शहीद अमरचंद बांठिया का जन्म 1793 में हुआ था। देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा शुरू से ही उनमें था। बाल्यकाल से ही अपने कार्यों से उन्होंने साबित कर दिया था कि देश की आन-बान और शान के लिए कुछ भी कर गुजरना है।
इतिहास में स्व. अमरचंद के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं मिलती, लेकिन कहा जाता है कि पिता के व्यावसायिक घाटे ने बांठिया परिवार को राजस्थान से ग्वालियर कूच करने के लिए मजबूर कर दिया और यह परिवार सराफा बाजार में आकर बस गया। तत्कालीन ग्वालियर रियासत के महाराज ने उन्हें उनकी कीर्ति से प्रभावित होकर राजकोष का कोषाध्यक्ष बना दिया।
सन १८५७ के विद्रोह ने देश की चारों दिशाओं में विप्लव की चिंगारी पैदा कर दी थी। भारतीय सैनिकों के लिए आर्थिक संकट की घड़ी पैदा होने के कारण कोई तत्कालीन हल नजर नहीं आ रहा था। ऐसे समय शहीद बांठिया ने भामाशाह बनकर सैनिकों और क्रांतिकारियों के लिए पूरा राजकोष खोल दिया। यह धनराशि उन्होंने ८ जून १८५८ को उपलब्ध कराई। उनकी मदद के बल पर वीरांगना लक्ष्मीबाई दुश्मनों के छक्के छु़ड़ाने में सफल रहीं, लेकिन अँगरेज सरकार ने बांठिया के कृत्य को राजद्रोह माना और वीरांगना के शहीद होने के चार दिन बाद अमरचंद बांठिया को राजद्रोह के अपराध में सराफा में नीम के पेड़ पर फाँसी दे दी। अँगरेजों ने भले ही उन्हें फाँसी पर लटका दिया हो, पर उनका कार्य और शहादत हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।
अब आधा ही बचा नीम का पेड़
सराफा बाजार में जिस नीम के पेड़ पर अमर शहीद को फांसी दी गई थी, उसे कुछ लोगों ने अपने निजी स्वार्थ के चलते कुछ वर्षों पूर्व आधा कटवा दिया था, जिस वजह से ये पेड़ अब ठूँठ के रूप में आधा ही रह गया है।
भारत को आजादी यूँ ही नहीं मिली। इसके लिए कई लोगों ने अपनी कुरबानी दी थी, तब जाकर हिन्दुस्तान स्वतंत्र हुआ। इन महानायकों की अपनी विशेष भूमिका रही। ग्वालियर के ऐसे ही महानायक शहीद अमरचंद बांठिया ने अपना जीवन मातृभूमि के नाम समर्पित करते हुए हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को अपने गले से लगा लिया। २२ जून को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर कई कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं, पर जरूरत है इन कार्यक्रमों के साथ-साथ उन्हें सच्चे दिल से याद करने की।
कौन थे शहीद बांठिया
राजस्थान की राजपूतानी शौर्य भूमि में बीकानेर में शहीद अमरचंद बांठिया का जन्म 1793 में हुआ था। देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा शुरू से ही उनमें था। बाल्यकाल से ही अपने कार्यों से उन्होंने साबित कर दिया था कि देश की आन-बान और शान के लिए कुछ भी कर गुजरना है।
इतिहास में स्व. अमरचंद के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं मिलती, लेकिन कहा जाता है कि पिता के व्यावसायिक घाटे ने बांठिया परिवार को राजस्थान से ग्वालियर कूच करने के लिए मजबूर कर दिया और यह परिवार सराफा बाजार में आकर बस गया। तत्कालीन ग्वालियर रियासत के महाराज ने उन्हें उनकी कीर्ति से प्रभावित होकर राजकोष का कोषाध्यक्ष बना दिया।
सन १८५७ के विद्रोह ने देश की चारों दिशाओं में विप्लव की चिंगारी पैदा कर दी थी। भारतीय सैनिकों के लिए आर्थिक संकट की घड़ी पैदा होने के कारण कोई तत्कालीन हल नजर नहीं आ रहा था। ऐसे समय शहीद बांठिया ने भामाशाह बनकर सैनिकों और क्रांतिकारियों के लिए पूरा राजकोष खोल दिया। यह धनराशि उन्होंने ८ जून १८५८ को उपलब्ध कराई। उनकी मदद के बल पर वीरांगना लक्ष्मीबाई दुश्मनों के छक्के छु़ड़ाने में सफल रहीं, लेकिन अँगरेज सरकार ने बांठिया के कृत्य को राजद्रोह माना और वीरांगना के शहीद होने के चार दिन बाद अमरचंद बांठिया को राजद्रोह के अपराध में सराफा में नीम के पेड़ पर फाँसी दे दी। अँगरेजों ने भले ही उन्हें फाँसी पर लटका दिया हो, पर उनका कार्य और शहादत हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।
अब आधा ही बचा नीम का पेड़
सराफा बाजार में जिस नीम के पेड़ पर अमर शहीद को फांसी दी गई थी, उसे कुछ लोगों ने अपने निजी स्वार्थ के चलते कुछ वर्षों पूर्व आधा कटवा दिया था, जिस वजह से ये पेड़ अब ठूँठ के रूप में आधा ही रह गया है।
कहानी
बँटवारे का चक्कर
एक जंगल में एक सियार अपनी पत्नी के साथ रहता था। एक दिन उसकी पत्नी को ताजी मछली खाने की तीव्र इच्छा हुई। सियार अपनी पत्नी से वादा कर नदी किनारे पहुँचा, ताकि मछलियों का कुछ जुगाड़ किया जा सके। वह बहुत देर तक वहाँ मछलियों की तलाश करता रहा पर उसे कुछ दिखलाई नहीं पड़ा।

तभी उसने वहाँ देखा कि दो ऊदबिलाव एक बड़ी मछली को नदी में से खींचकर बाहर ला रहे हैं। वह ऊदबिलावों के पास पहुँचा और उसने कहा- मित्रों, तुम दोनों ने मिलकर यह मछली पकड़ तो ली है, परंतु इसका बँटवारा तुम कैसे करोगे? ज्यादा अच्छा हो यदि तुम किसी तीसरे से इसका बँटवारा करवाओ।
दोनों ऊदबिलावों को यह बात जम गई। आसपास कोई तीसरा था नहीं, लिहाजा उन्होंने सियार से ही बँटवारा करने को कहा। सियार तो पहले से ही इस बात की फिराक में था कि किसी तरह इन दोनों को मूर्ख बनाकर बँटवारे का मामला जमा दिया जाए। खैर सियार ने मछली के तीन हिस्से किए। सिर एक ऊदबिलाव को दिया। पूँछ दूसरे को। बीच का पूरा हिस्सा लेकर वह अपने घर की ओर चलने लगा। ऊदबिलावों ने उसे रोका और पूछा- अरे, ये क्या करते हो? तुम तो मछली का बँटवारा हम दोनों में कर रहे थे।
सियार ने जवाब दिया- मूर्खों, तुम दोनों को बराबर का हिस्सा मिल चुका है। यह जो मैं ले जा रहा हूँ, वह तो मेरा मेहनताना है। यह कह कर वह मछली के बड़े हिस्से को लेकर चला गया। ऊदबिलावों ने अपना सिर धुन लिया।
अगर वे बँटवारे के चक्कर में न पड़ते तो उन्हें मछली का सारा हिस्सा मिलता और इस तरह सियार मछली को हड़प नहीं भी नहीं पाता । तब दोनों ने तय किया कि भविष्य में वे किसी भी तीसरे के चक्कर में नहीं आएँगे।
एक जंगल में एक सियार अपनी पत्नी के साथ रहता था। एक दिन उसकी पत्नी को ताजी मछली खाने की तीव्र इच्छा हुई। सियार अपनी पत्नी से वादा कर नदी किनारे पहुँचा, ताकि मछलियों का कुछ जुगाड़ किया जा सके। वह बहुत देर तक वहाँ मछलियों की तलाश करता रहा पर उसे कुछ दिखलाई नहीं पड़ा।

तभी उसने वहाँ देखा कि दो ऊदबिलाव एक बड़ी मछली को नदी में से खींचकर बाहर ला रहे हैं। वह ऊदबिलावों के पास पहुँचा और उसने कहा- मित्रों, तुम दोनों ने मिलकर यह मछली पकड़ तो ली है, परंतु इसका बँटवारा तुम कैसे करोगे? ज्यादा अच्छा हो यदि तुम किसी तीसरे से इसका बँटवारा करवाओ।
दोनों ऊदबिलावों को यह बात जम गई। आसपास कोई तीसरा था नहीं, लिहाजा उन्होंने सियार से ही बँटवारा करने को कहा। सियार तो पहले से ही इस बात की फिराक में था कि किसी तरह इन दोनों को मूर्ख बनाकर बँटवारे का मामला जमा दिया जाए। खैर सियार ने मछली के तीन हिस्से किए। सिर एक ऊदबिलाव को दिया। पूँछ दूसरे को। बीच का पूरा हिस्सा लेकर वह अपने घर की ओर चलने लगा। ऊदबिलावों ने उसे रोका और पूछा- अरे, ये क्या करते हो? तुम तो मछली का बँटवारा हम दोनों में कर रहे थे।
सियार ने जवाब दिया- मूर्खों, तुम दोनों को बराबर का हिस्सा मिल चुका है। यह जो मैं ले जा रहा हूँ, वह तो मेरा मेहनताना है। यह कह कर वह मछली के बड़े हिस्से को लेकर चला गया। ऊदबिलावों ने अपना सिर धुन लिया।
अगर वे बँटवारे के चक्कर में न पड़ते तो उन्हें मछली का सारा हिस्सा मिलता और इस तरह सियार मछली को हड़प नहीं भी नहीं पाता । तब दोनों ने तय किया कि भविष्य में वे किसी भी तीसरे के चक्कर में नहीं आएँगे।
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