रविवार, 14 फ़रवरी 2010

कविता

अपने सपने पूरे करो


खुद पर यकीं तुम करके अपने सपने पूरे करो,
जिंदगी में ढेरों खुशियों की तुम महक भरो।
सच्चाई का रास्ता बमुश्किल, पर देता है बहुत सुकून,
झूठ, फरेब और बेईमानी से तुम हर वक्त डरो।
हिम्मत के ये पैर तुम्हारे कभी न हो कमजोर,
हौसलों के पंखों से तुम ऊँची उड़ान भरो।
जुनूँ और जज्बा-जोश हो तो फिर क्या है मुश्किल,
मजबूती से कदम बढ़ाकर ख्वाबों को साकार करो।
उपलब्धि के शिखर को छूकर दंभ न करना बंदे,
चाहे कितनी मिले सफलता, पाँव जमीं से मत छोड़ो।
जीवन में कुछ पाया है तो उसे बाँटना तुम सीखो,
कठिन राह में निराश हो रहे लोगों के तुम कष्ट हरो।
उमंग, उत्साह, संघर्ष का ही नाम है जिंदगी मगर,
काँटों से तुम बचते रहो, मंजिल पर ध्यान धरो।

(पुस्तक 'मन तरंग' से)

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

हँसगुल्ले

एक चोर तेजी से दौड़ता हुआ गली के मोड़ पर खड़े सिपाही से टकरा गया। सिपाही ने उसे डाँटते हुए कहा- 'कौन हो तुम?'
पहले तो चोर घबराया, फिर भागते हुए बोला- 'चोर।'
सिपाही बोला- 'अजीब पागल है, पुलिस से मजाक करता है।'


आकाश (अपने दोस्त से) : 'अरे यार! मैं अमेरिका जाने की सोच रहा हूँ, कितने रुपए लगेंगे?'
सचिन : 'सोचने के कोई रुपए नहीं लगते।'

एक आदमी (पहलवान से)- 'तुम मेरे तीस दाँत तोड़ने की धमकी दे रहे हो। पूछ सकता हूँ बाकी के दो दाँतों पर इतना रहम क्यों?'
पहलवान- 'त्योहारों का मौसम है, इसलिए विशेष छूट दे रहा हूँ।'

एक आदमी (दुकानदार से)- 'जल्दी से एक पिंजरा दे दो। मुझे गाड़ी पकड़नी है।'
दुकानदार- 'मेरे पास इतना बड़ा पिंजरा नहीं है कि जिसमें गाड़ी पकड़ी जा सके।'


एक आदमी बस स्टैंड पर खड़ा बस का इंतजार कर रहा था। तभी, बस आई और थोड़ी देर रुककर चल दी। वह आदमी बस पर चढ़ नहीं पाया तो बस के पीछे-पीछे दौड़ने लगा, दौड़ते-दौड़ते वह अपने घर तक पहुँच गया और घर पहुँचकर पत्नी से बोला- 'देखो मैं कितना बुद्धिमान हूँ बस के पीछे दौड़कर घर पहुँचा और 2 रपए बचाए।'
पत्नी : 'अगर तुम टैक्सी के पीछे दौड़ते तो ज्यादा पैसे बचते।'

राजू (पिता से) : 'पिताजी! मैं क्लास में ब्लैकबोर्ड नहीं देख पाता।'
पिताजी उसे तुरंत आँखों के डॉक्टर के पास ले गए।
डॉक्टर : 'राजू! तुम्हें ब्लैकबोर्ड देखने में क्या परेशानी होती है?'
राजू : 'जी, मेरे सामने एक लंबा लड़का बैठता है।'

डॉक्टर : 'आपकी खाँसी कैसी है?'
मरीज : 'खाँसी तो चली गई, लेकिन आँखें आ गई है।'
डॉक्टर : 'घबराइए नहीं, वे भी चली जाएँगी।'

पिताजी : 'बेटी! तुम मेरी इस कानून की किताब को चिमटे से पकड़कर क्यों ला रही हो?'
बेटी : ' पिताजी! आप ही तो कहते हैं, कि हमें कानून को हाथों में नहीं लेना चाहिए।'

क्या तुम जानते हो?

रोबोट का सफर...
* सबसे पहले 1495 में ह्यूमनॉइड रोबोट का डिजाइन 'लेयोनार्डो डा विंची' ने बनाया था।
* 1920 में रोबोट शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल चेक लेखक 'कारेल लेपेक' ने अपने नाटक आर.यू.आर. के लिए किया था।
* रोबोटा शब्द का प्रयोग चेक और स्लोवाक भाषा में किया गया।
* 1950 में डा विंची की नोटबुक्स जब मिली तब कहीं जाकर इसका पता चल सका।
* 1981 में पहली बार एक जापानी अपनी गलती की वजह से रोबोट के हाथों मारा गया था।
* इन दिनों चलने वाले रोबोट पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, जैसे सिग्मो, कुरियो, असिमो और हूबो।
* रोबोट के क्षेत्र में रिसर्च को बायोमॉर्फिक रोबोटिक्स कहा जाता है।
* ताजातरीन शोध के मुताबिक दिमाग रोबोट की तरह ही सीखता है।

कहानी

ऐसे आई समझ
एक था बूढ़ा पाला - बड़ा समझदार और अनुभवी! उसका नौजवान बेटा जाड़ा एकदम नासमझ और बड़बोला था, एक दिन उसने पिता से डींग मारी - 'मैं जिसे चाहूँ, मिनटों में ठंड से अकड़ा सकता हूँ।'
'ऐसा समझना कोरा भ्रम है बेटा''
बूढ़े पाला ने समझाया। मैं अभी प्रमाण देता हूँ। नौजवान जाड़ा ने उत्तेजित होकर कहा और चारों तरफ निगाह दौड़ाई... सामने एक मोटा-ताजा सेठ दिखा गरम कपड़ों और कीमती शाल से लदा-फदा! जाड़े ने उसे जा घेरा। सेठ देखते-देखते ठंड से काँपने लगा। देख लीजिए पिताजी! जाड़े ने शेखी बघारी 'पहलवान जैसे सेठ पर मैंने कैसी बुरी गुजार दी। अब तो मान गए न मेरी बात?'

नहीं, बूढ़ा पाला हँसा, फिर बैलगाड़ी लेकर जंगल की तरफ जाते एक फटेहाल किसान को दिखाकर बोला - 'बेटा, तेरी बात मैं तब मान सकता हूँ, जब तू उसे छका दे।'
जाड़े ने बाप की तरफ देखा और बड़े घमंड से कहा - 'अभी चित करता हूँ। वह तुरंत उड़कर किसान के पास पहुँच गया और उसे दबोचना शुरू किया। उसने कमजोर बैल के जूए से कंधा भिड़ाया और बैलगाड़ी खींचने में मदद देने लगा।

जाड़ा उसकी कन‍पटियाँ, हाथ-पैर, और गर्दन पर चुटकियाँ काटता रहा, लेकिन किसान पर असर नहीं पड़ रहा था। क्योंकि गाड़ी में जोर लगाने से उसके शरीर से गरमी छिटक रही थी। जाड़ा हैरान था - कितना मजबूत है यह पिद्दी भर का आदमी! मगर उसने हिम्मत न हारी, किसान के पीछे पड़ा रहा। मन में सोच रहा था, यहाँ न सही, जंगल में तो अकड़ा ही दूँगा। कितनी देर झेल पाएगा मुझे? जंगल पहुँच कर किसान ने बैलगाड़ी रोक दी।

अब वह कुल्हाड़ी उठाकर सूखी लकड़ियाँ काटने लगा। जाड़ा जैसे-जैसे उस पर हमला करता, उसकी कुल्हाड़ी चलाने की गति बढ़ती गई। देखते-देखते उसने गाडी भर लकडी काट डाली। देह में ऐसी गर्मी आई कि पसीना चूने लगा। उसने सिर की पगड़ी उतारकर जमीन पर रख दी।

जाड़े का कोई वश न चला, तो पगड़ी में जा बैठा। लकड़ी लाद चुकने के बाद किसान ने पगड़ी उठाई। उसे बरफ सा ठंडा पाकर वह गरम हथेलियों से मसल-मसल कर पगड़ी को गरमाने लगा। जाड़ा ज्यादा समय तक किसान के हाथों की रगड़ न झेल पाया। वह पिटा सा मुँह लेकर पिता के पास लौट आया। बूढ़ा पाला उसकी दशा देखकर हँस पड़ा। बोला 'बेटा! आरामतलब लोगों को तुम छका सकते हो। मगर मेहनती लोगों के आगे तुम्हारी तो क्या, किसी भी मुसीबत की नहीं चल पाती।'
सौजन्य से - देवपुत्र


चिड़िया से दोस्ती

ओमप्रकाश बंछोर
मैं अपने घर में चिड़ियों का आना पसंद नहीं करता था। चिड़िया आती और इधर उधर गंदा करती थी। मैं पूरा दिन झाडू लेकर उनके पीछे भागता रहता था कि कहीं वे पंखे के उपर अपना घोंसला न बना लें। चिड़िया मेरे घर में बैठी होती और मैं बाहर कहीं से भी आता तो मुझे देखकर उड़ जाती।

मैं खुश हो जाता था कि देखा मुझसे डरती है। स्कूल से आने के बाद मेरा सबसे पहला काम यही होता था कि मैं देखूँ कि चिड़िया कहीं से कचरा उठाकर घर में तो नहीं ला रही है।

स्कूल की परीक्षा के दिन जब चालू हुए थे तो पेड़ों से पत्तियाँ और बारीक लकड़ियाँ टूटकर गिर जाती थी। चिड़िया सारा कचरा उठाकर घर में ले आती और घोंसला बनाने लगती। मुझे देखती तो कचरा बाहर फेंक देती। परीक्षा जब खत्म हुई तो पापा ने मुझसे कहा कि इस बार वे मुझे घुमाने के लिए राजीव अंकल के यहाँ अल्मोड़ा ले जाने वाले हैं। मैं सुनकर बहुत खुश हुआ।

राजीव अंकल का बेटा सतीश मेरा बहुत अच्छा दोस्त था और पहले हम इकट्ठा पढ़ते थे। दो कक्षा तक साथ पढ़ने के बाद सतीश अल्मोड़ा चला गया। खैर मुझे सतीश से मिलने की खुशी हो रही थी। मैंने अल्मोड़ा के लिए निकलने से पहले घर की हर खिड़की खुद बंद की ताकि चिड़िया गंदा न करें। हम ट्रेन से अल्मोड़ा के लिए निकले। अल्मोड़ा पहुँचकर मैं सतीश से मिलकर बहुत खुश हुआ। हम दोनों ने ढेर सारी बातें की। सतीश ने मुझे कहा कि शाम को वह मुझे कुछ खास दिखाने वाला है।

शाम को हम दोनों उसके घर की छत पर थे। मैंने देखा सतीश ने छत पर एक शेड लगा रखा है। छोटे छोटे कटोरों में बहुत सी जगहों पर पानी भरा रखा है और कुछ रंग बिरंगे पंख बिखरे पड़े हैं। सतीश के हाथ में एक छोटी थैली भी थी जिसमें कुछ अनाज के दाने थे। उसने कहा यह देखो और दाने जमीन पर डालकर डब्बा बजाया। थोड़ी ही देर में छत तरह तरह के रंग बिरंगे पक्षियों से भर गई। पक्षियों और खासकर चिड़ियों से मैं बहुत चिढ़ता था।

पहली बार इतने पक्षी देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने देखा चिड़िया सतीश के हाथों से दाने खा रही है। सतीश ने कुछ दाने मेरे हाथ में भी दिए और चिड़िया ने आकर वे दाने खाए। मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने सतीश से पूछा कि उसने यह सब कैसे किया। सतीश बोला पहले एक चिड़िया ने घर में घोंसला बनाया और जब उसने इस तरह की व्यवस्था की तो शाम को बहुत सी चिड़िया आने लगी। दाने पानी का इंतजाम पक्षियों को खूब भाया। मैंने पूछा और गंदगी। सतीश बोला बस एक बार झाडू लगाना पड़ती है और क्या।

मेरे समझ में आ गया था कि झाड़ू लेकर दिन भर चिड़िया के पीछे दौड़ने से अच्छा था कि छत पर ऐसी व्यवस्था करके एक बार झाडू लगा दी जाए। महीने भर बाद घर आकर मैंने भी ऐसा ही किया और अब मेरे घर भी बहुत सी सुंदर चिड़िया आती है। उनके साथ वक्त गुजारना मुझे अच्छा लगता है।


मन का राजा
शेष नारायन बंछोर
एक राजा और फकीर बहुत सँकरी पगडंडी पर आमने-सामने टकरा गए। अब दोनों रास्ते को कैसे पार करें? जब एक झुककर रास्ते से हटता तो दूसरे को रास्ता मिलता। राजा अपने अहं में था- उसने फकीर से कहा- ऐ फकीर चल हट मुझे रास्ता दे, क्योंकि मैं राजा हूँ।

फकीर ने कहा- आप भूमि के राजा हैं, मैं तो मन का राजा हूँ- पहले आप मुझे रास्ते दें। इस पर राजा ने कहा कि यदि तुम राजा हो तो हथियार कहाँ है? फकीर ने कहा कि मेरे विचार मेरे हथियार हैं।

राजा ने पूछा तुम्हारी सेना कहाँ है? फकीर ने कहा मेरी किसी से दुश्मनी नहीं है, जो सेना रखूँ। फकीर के उत्तर से राजा हैरान हो गया। राजा ने फिर कहा कि यदि तुम राजा हो तो तुम्हारे पास धन कहाँ है। फकीर ने कहा कि मेरा ज्ञान ही मेरा धन है।

राजा ने कहा कि तुम्हारे नौकर-चाकर कहाँ हैं- फकीर ने कहा कि मेरी इंद्रियाँ ही मेरी नौकर-चाकर हैं। यह सब सुनकर राजा समझ गया कि यह कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। राजा फकीर के उत्तर सुनकर विचारवान हो गया और फकीर को रास्ता दे दिया। लौकिक सुख-सुविधाएँ क्षणिक हैं। पल भर में व्यक्ति राजा से रंक हो जाता है। रंक से राजा हो जाता है। संत फकीर अपनी मस्ती में शाश्वत मन के राजा होते हैं।


बंदर और मगरमच्‍छ


शिप्रा नदी के किनारे एक बड़ा-सा जामुन का पेड़ था। उस पेड पर एक बंदर रहता था। नीचे नदी में एक मगरमच्‍छ अपनी बीवी के साथ रहता था। धीरे-धीरे मगरमच्‍छ और बंदर में दोस्‍ती हो गई।
बंदर पेड़ से मीठे-मीठे रसीले जामुन‍ गिराता था और मगरमच्‍छ उन जामुनों को खाया करता था। एक बार कुछ जामुन मगरमच्‍छ अपनी बीवी के लिए ले गया।
मीठे और रसीले जामुन खाने के बाद मगरमच्‍छ की पत्नि ने सोचा कि जब जामुन इतने मीठे हैं तो इन जामुनों को रोज खाने वाले बंदर का कलेजा कितना मीठा होगा?
उसने मगरमच्‍छ से कहा कि तुम अपने दोस्‍त बंदर को घर लेकर आना। मैं उसका कलेजा खाना चाहती हूँ।
अगले दिन जब नदी किनारे मगरमच्‍छ और बंदर मिले तो मगरमच्‍छ ने बंदर को अपने घर चलने के लिए कहा। बंदर ने कहा कि मैं तुम्‍हारे घर कैसे चल सकता हूँ? मुझे तो तैरना नहीं आता।
तब मगर ने कहा कि मैं तुम्‍हे अपनी पीठ पर बैठा कर ले चलूँगा। मगरमच्‍छ की पीठ पर बैठकर नदी में घुमने और उसके घर जाने के लिए बंदर ने तुरंत हाँ कर दी।
बंदर झट से मगर की पीठ पर बैठ गया। मगरमच्‍छ नदी में उतरा और तैरने लगा। बंदर पहली बार नदी में सैर कर रहा था। उसे बहुत मजा आ रहा था। दोनों दोस्‍तों ने आपस में बातचीत करना शुरू कर दी।

आपस में बात करते हुए वो दोनों नदी के बीच में पहुँच गए। बातों-बातों में मगर ने बंदर को बताया कि उसकी पत्‍नी ने बंदर का कलेजा खाने के लिए उसे बुलाया है।
मगरमच्‍छ के मुँह से ऐसी बात सुनकर बंदर को झटका लग गया। उसने खुद को संभालते हुए कहा कि दोस्‍त ऐसी बात तो तुझे पहले ही बताना थी। हम बंदर अपना कलेजा पेड़ पर ही रखते हैं। अगर तुम्‍हें मेरा कलेजा खाना है तो मुझे वापस ले जाना होगा।
मैं पेड़ से अपना कलेजा लेकर फिर तुम्‍हारी पीठ पर सवार हो जाऊँगा। हम वापस तुम्‍हारे घर चलेंगे। तब भाभीजी मेरा कलेजा खा लेंगी।
मगर ने बंदर की बात मान ली और वह पलटकर वापस नदी के किनारे की ओर चल दिया। नदी के किनारे पर आने के बाद मगर की पीठ से बंदर उतरा। उसने मगर से कहा कि वो अपना कलेजा लेकर अभी वापस आ रहा है।
बंदर पेड़ पर चढ़ गया। पेड़ पर चढ़ने के बाद बंदर ने मगर से कहा कि आज से तेरी- मेरी दोस्‍ती खत्‍म। बंदर अपना कलेजा पेड़ पर रखेंगे तो जिंदा कैसे रहेंगे?
इस तरह अपनी चतुराई और मोनू ने अपनी जान बचा ली और मूर्ख सोनू मुँह लटकाकर लौट गया।

कविता

भारत माँ
देवभूमि भारत माता पर, हम सबको अभिमान है।
पावन कण-कण यहाँ अनोखा, दर्शन यहाँ महान है।

छोटे-बड़े प्रदेश यहाँ पर, संस्कृति सबकी एक है।
भोजन, भाषा, वेश भिन्न पर आत्मा सबकी एक है।

विन्ध्य हिमालय अरावली और मलय, नीलगिरि पर्वत हैं।
गंगा, यमुना, सिंधु, नर्मदा नदियाँ इसी धरा पर हैं।

बारह ज्योतिर्लिंग यहाँ पर, शंकर चारों धाम हैं।
शिव, प्रताप, कान्हा की धरती, घर-घर में श्रीराम हैं।

जग सिरमौर बने फिर भारत हम सबका अरमान है।
देवभूमि भारत माता पर हम सबको अभिमान है।
सौजन्य से - देवपुत्र

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

कहानी

नोनू भटका मेले में
-सत्यनारायण भटनागर
कुछ महीनों पहले एक मेला देखने नोनू अपने माता- 1पिता के साथ गया। मेले जाने के पहले माँ ने उसे समझाया,'देखो उँगली पकड़कर चलना। मेले में बहुत भीड़ होती है।
यदि उँगली छोड़ी और भटक गए तो फिर परेशानी होगी और देखो यदि साथ छूट ही जाए तो रोना मत। तुम्हारे जेब में घर का पता, मोबाइल नंबर लिखकर रख दिया है। किसी भी पुलिसवाले भैया से कहोगे तो वह तुम्हारी मदद करेगा।'
नोनू को मजा आ गया। उसे तो मेले में जाने की जल्दी थी। मेले में भीड़ ही भीड़ थी। बड़े-बड़े लोगों में बच्चे तो बेचारे दिखते ही नहीं थे।
कोई बच्चा गोद में था तो कोई कंधे पर। नोनू माँ के पीछे ऐसे चल रहा था, जैसे रस्सी से बँधा हो। उसे कष्ट हो रहा था। यह भी कोई चलना है। यह भी कोई आनंद है। वह सोच ही रहा था कि खुला मैदान आ गया।

मैदान में दुकानें थीं। फुग्गेवाले थे। खिलौने की दुकानें थीं। उसने फुग्गे के लिए हठ की। पापा ने फुग्गा खरीद दिया। फिर सीटी खरीदी और चाट खाने के लिए बैठ गए।

इधर-उधर देखते, उछलते-कूदते, गुनगुनाते नोनूजी चल रहे थे कि भीड़ का रेला आया और जिसका डर था, वही हुआ।

उनकी माँ की उँगली छूट गई और उन्होंने भीड़ के बीच अपने को अकेला पाया। पहले तो नोनू रूआँसा हुआ, मगर घबराया नहीं। माँ ने उसकी जेब में घर का पता और मोबाइल नंबर जो रखा था।
वह मैदान में एकतरफ खड़ा सोच ही रहा था कि एक दीदी उसको उसकी ओर मुस्कुराते दिखी। वह भी मुस्कुराया। वह दीदी पास आई पूछा- 'क्या भटक गए हो?'

नोनू ने भोलेपन से कहा- 'मेरे माता-पिता खो गए हैं। उन्हें खोजना है।' दीदी ने पूछा- 'तुम्हारे पास पता है?' नोनू ने जेब से पता निकालकर बताया।

दीदी बोली- 'ठीक है, हम तुम्हें घर तक पहुँचा देंगे।'

नोनू ने कहा- 'क्या आपके पास मोटर गाड़ी है? मेरा घर तो बहुत दूर है।' दीदी हँसी। बोली- 'मैं परी हूँ। मैं तुम्हें गाड़ी से भी जल्दी पहुँचा दूँगी।'

नोनू ने कहा- 'आप कैसी परी हैं? परी तो सफेद वस्त्र पहनती है। आप तो यूनिफॉर्म पहने हुए हो।'

परी ने कहा- 'हम मेले की परी हैं। खोए हुए बच्चों की परी। हम भी मेला घूमने-फिरने, मजा करने आई हैं। जो बच्चे दूसरों के साथ मित्रता और प्रेम से रहते हैं, हम उनसे दोस्ती करती हैं और उनकी मदद करती हैं।'

परी ने नोनू को ऑटो रिक्शा में बिठाया और नोनू अपने माता के पास आ गया। माँ ने पूछा- 'कहाँ भटक गए थे? कौन लाया तुम्हें?' नोनू ने कहा- 'हमें परी लाई है। बड़ी प्यारी सहेली है हमारी, आप भी मिल लो।'

नोनू पलटा तो वहाँ न तो परी थी और न ऑटो रिक्शा। वे जा चुके थे। माँ ने कहा- 'देखो नोनू यदि मेले में भटक जाओ तो चाहे जिसके साथ चल देना ठीक नहीं। पुलिस या स्काउट की मदद ही लेना चाहिए। ऐसे अपरिचितों के साथ चल देने में खतरे भी हैं। इस तरह नहीं आना चाहिए था।'

नोनू के आगे उस परी का भोलाभाला चेहरा दिखाई दिया। उसके पंख नहीं थे और वह यूनिफॉर्म पहने थी और चल भी रही थी ऑटो रिक्शा में। फिर भी वह साफ दिल की परी थी।

उसने तो साफ कहा कि जो बच्चे दूसरे बच्चों से प्रेम करते हैं, वे उनसे दोस्ती करती है। वह मन ही मन मुस्कुराया। दूसरे बच्चों के साथ सच्ची मित्रता व सहयोग करने वाली दीदियाँ परियाँ ही तो होती हैं, भले ही वे स्वप्न में न आई हों। नोनू फिर से अपने खेलने में लग गया।
चल मेरे कद्दू टुनूक टुनूक
- विभा नरगुन्दे
एक गाँव में एक बुढ़िया रहती थी। उसकी बेटी की शादी उसने दूसरे गाँव में की थी। अपनी बेटी से मिले बुढ़िया को बहुत दिन हो गए। एक दिन उसने सोचा कि चलो बेटी से मिलने जाती हूँ।
यह बात मन में सोचकर बुढ़िया ने नए-नए कपड़े, मिठाइयाँ और थोड़ा-बहुत सामान लिया। और चल दी अपनी बेटी के गाँव की ओर।
चलते-चलते उसके रास्ते में जंगल आया। उस समय तक रात होने को आई और अँधेरा भी घिरने लगा। तभी उसे सामने से आता हुआ बब्बर शेर दिखाई दिया।

बुढ़िया को देख वह गुर्राया और बोला- बुढ़िया कहाँ जा रही हो? मैं तुम्हें खा जाऊँगा।

बुढ़िया बोली- शेर दादा, शेर दादा तुम मुझे अभी मत खाओ। मैं अपनी बेटी के घर जा रही हूँ। बेटी के घर जाऊँगी, खीर-पूड़ी खाऊँगी। मोटी-ताजी हो जाऊँगी फिर तू मुझे खाना।

शेर ने कहा- ठीक है, वापसी में मिलना।

फिर बुढ़िया आगे चल दी। आगे रास्ते में उसे चीता मिला। चीते ने बुढ़िया को रोका और वह बोला- ओ बुढ़िया कहाँ जा रही हो?

बुढ़िया बड़ी मीठी आवाज में बोली- बेटा, मैं अपनी बेटी के घर जा रही हूँ। चीते ने कहा- अब तो तुम मेरे सामने हो और मैं तुम्हें खाने वाला हूँ।

बुढ़िया गिड़गिड़ाते हुए कहने लगी- तुम अभी मुझे खाओगे तो तुम्हें मजा नहीं आएगा। मैं अपनी बेटी के यहाँ जाऊँगी वहाँ पर खीर-पूड़ी खाऊँगी, मोटी-ताजी हो जाऊँगी, फिर तू मुझे खाना।

चीते ने कहा- ठीक है, जब वापस आओगी तब मैं तुम्हें खाऊँगा।

फिर बुढ़िया आगे बढ़ी। आगे उसे मिला भालू। भालू ने बुढ़िया से वैसे ही कहा जैसे शेर और चीते ने कहा था। बुढ़िया ने उसे भी वैसा ही जवाब देकर टाल दिया।

सबेरा होने तक बुढ़िया अपनी बेटी के घर पहुँच गई। उसने रास्ते की सारी कहानी अपनी बेटी को सुनाई।बेटी ने कहा कि माँ फिक्र मत करो। मैं सब संभाल लूँगी।

बुढ़िया अपनी बेटी के यहाँ बड़े मजे में रही। चकाचका खाया-पिया, मोटी-ताजी हो गई। एक दिन बुढ़िया ने अपनी बेटी से कहा कि अब मैं अपने घर जाना चाहती हूँ।

बेटी ने कहा कि ठीक है। मैं तुम्हारे जाने का बंदोबस्त कर देती हूँ।

बेटी ने आँगन की बेल से कद्दू निकाला। उसे साफ किया। उसमें ढेर सारी लाल मिर्च का पावडर और ढेर सारा नमक भरा।

फिर अपनी माँ को समझाया कि देखो माँ तुम्हें रास्ते में कोई भी मिले तुम उनसे बातें करना और फिर उनकी आँखों में ये नमक-मिर्च डालकर आगेबढ़ जाना। घबराना नहीं।
बेटी ने भी अपनी माँ को बहुत सारा सामान देकर विदा किया। बुढ़िया वापस अपने गाँव की ओर चल दी। लौटने में फिर उसे जंगल से गुजरना पड़ा। पहले की तरह उसे भालू मिला।

उसने बुढ़िया को देखा तो वह खुश हो गया। उसने देखा तो मन ही मन सोचा अरे ये बुढ़िया तो बड़ी मुटिया गई है।

भालू ने कहा- बुढ़िया अब तो मैं तुम्हें खा सकता हूँ?

बुढ़िया ने कहा- हाँ-हाँ क्यों नहीं खा सकते। आओ मुझे खा लो।

ऐसा कहकर उसने भालू को पास बुलाया। भालू पास आया तो बुढ़िया ने अपनी गाड़ी में से नमक-मिर्च निकाली और उसकी आँखों में डाल दी।

इतना करने के बाद उसने अपने कद्दू से कहा- चल मेरे कद्दू टुनूक-टुनूक। कद्दू अनोखा था, वह उसे लेकर बढ़ चला।

बुढ़िया आगे बढ़ी फिर उसे चीता मिला। बुढ़िया को देखकर चीते की आँखों में चमक आ गई।

चीता बोला- बुढ़िया तू तो बड़ी चंगी लग रही है। अब तो मैं तुम्हें जरूर खा जाऊँगा और मुझे बड़ी जोर की भूख लग रही है।

बुढ़िया ने कहा- हाँ-हाँ चीतेजी आप मुझे खा ही लीजिए। जैसे ही चीता आगे बढ़ा बुढ़िया ने झट से अपनी गाड़ी में से नमक-मिर्च निकाली और चीते की आँखों में डाल दी।

चीता बेचारा अपनी आँखें ही मलता रह गया। बुढ़िया ने कहा- चल मेरे कद्दू टुनूक-टुनूक। आगे उसे शेर मिला।

बुढ़िया और कद्दू ने उसके साथ भी ऐसी ही हरकत की। इस तरह बुढ़िया और उसकी बेटी की चालाकी ने उसे बचा लिया। वह सुरक्षित अपने घर पहुँच गई।

काव्य-संसार

अब कभी मत लौटना साथी NDदेर रात जब
सितारों की झिलमिलाती बूँदें
फिसलती है आसमानी आँगन में
और मैं लौट आती हूँ
अपने ही मन-मासूम के पास,
तब मुस्कुराता-खिलता
तुम्हारा
गुलाबी चेहरा
खूब आता है याद।

जब मैं रोती हूँ अपने ही मन के
उदास खाली कोने में बैठ अकेली,
तब तुम्हारी आँखों के
कोमल उजाले में
दमक उठती है मेरी रात अँधेरी।

अब कभी मत लौटना साथी, मेरे दुश्मन,
तुमसे बेहतर है
तुम्हारी यादों का सर्द मौसम।