अँधेरे के दर्शन
सोनू (मोनू से) : मुझे तो आँख बंद करने पर भी दिखाई देता है।
मोनू (हैरानी से) क्या दिखाई देता है?
सोनू : अँधेरा।
गुरुवार, 4 मार्च 2010
क्या तुम जानते हो?
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए
तनाव से भरी भागती-दौड़ती इस जिंदगी में किसी के चेहरे पर खुशी बिखेरना शायद आसमान के तारे तोड़ना जितना कठिन काम है, लेकिन दुनिया में कई ऐसे लोग हैं, जो दूसरों को खुशी देना अपने जीवन का लक्ष्य बनाए हुए हैं।
बच्चों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘बालमन’ की संयोजक अन्वेषा खली ने बताया कि दुनिया के सितमों के मारे बच्चों के चेहरे पर खुशी देखना शायद जीवन का सबसे खुशनुमा पल होता है।
अन्वेषा ने कहा ‘दुनिया में बहुत से बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें प्यार करना तो दूर कोई दो शब्द ठीक से भी नहीं बोलता। हम कोशिश करते हैं कि ऐसे बच्चों को आत्मसम्मान और खुशी दे सकें।’ अन्वेषा ने कहा ‘मैं लोगों से अपील करती हूँ कि वे जिंदगी में एक बार अनाथ और बेसहारा बच्चों को खुशी देने की कोशिश करें। इस खुशी को आप लाखों रुपए खर्च करके भी नहीं खरीद सकते।’
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और कई संस्थाओं के साथ स्वयंसेवक के तौर पर काम करने वाली पीतमपुरा निवासी प्रगति दोषी ने बताया कि जरूरतमंदों की मदद करना दोस्तों के साथ पार्टी करने से ज्यादा खुशी देता है।
कुछ पश्चिमी देशों में तीन मार्च को ‘आई वांट यू टू बी हैप्पी डे’’ मनाया जाता है। हमारे देश में इस दिन का चलन नहीं है लेकिन दूसरों को खुशी देने के लिए समर्पित इस दिन का महत्व जरूर समझ में आता है।
प्रगति ने कहा ‘मैं किसी भी खुशी के मौके पर पार्टी नहीं करती, बल्कि इसकी जगह पर मैं जरूरतमंद लोगों की जरूरतें पूरी करने में विश्वास रखती हूँ। मैं शहर के कई अनाथालयों में जाकर वहाँ बच्चों के बीच खिलौने और कपड़े बाँटती हूँ।’ प्रगति ने कहा ‘कई बच्चों को खिलौने देकर मैंने उनके चेहरे की खुशी को संजोकर रखने के लिए अपने कैमरे का उपयोग किया। इन फोटो ने मुझे दो प्रतियोगिताओं में जीत भी दिलाई।’
कुछ ऐसी ही कहानी शासकीय कर्मचारी आरके धोटे की भी है। ‘आसरा’ संस्था के लंबे समय से स्वयंसेवक धोटे अपना हर अवकाश संस्था में रह रहे बुजुर्गों की सेवा को समर्पित करते हैं।
धोटे ने बताया ‘मैंने हमेशा से बुजुर्गों की सेवा में दुनिया की खुशी देखी। इन बुजुर्गों के साथ थोड़ा समय बिताकर उनके सुख-दुख की बात करना उनके लिए सबसे बड़ी खुशी है।’ धोटे ने बताया ‘कभी-कभी बुजुर्ग अपने परिवार को याद कर परेशान हो जाते हैं। ऐसे में उनके साथ बैठना बहुत जरूरी हो जाता है। हम अगर किसी को खुशी देते हैं, तो इसमें हमारा कुछ नहीं जाता, लेकिन उनके चेहरे
पर आई मुस्कान जो सुकून देती है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल का काम है।’
तनाव से भरी भागती-दौड़ती इस जिंदगी में किसी के चेहरे पर खुशी बिखेरना शायद आसमान के तारे तोड़ना जितना कठिन काम है, लेकिन दुनिया में कई ऐसे लोग हैं, जो दूसरों को खुशी देना अपने जीवन का लक्ष्य बनाए हुए हैं।
बच्चों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘बालमन’ की संयोजक अन्वेषा खली ने बताया कि दुनिया के सितमों के मारे बच्चों के चेहरे पर खुशी देखना शायद जीवन का सबसे खुशनुमा पल होता है।
अन्वेषा ने कहा ‘दुनिया में बहुत से बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें प्यार करना तो दूर कोई दो शब्द ठीक से भी नहीं बोलता। हम कोशिश करते हैं कि ऐसे बच्चों को आत्मसम्मान और खुशी दे सकें।’ अन्वेषा ने कहा ‘मैं लोगों से अपील करती हूँ कि वे जिंदगी में एक बार अनाथ और बेसहारा बच्चों को खुशी देने की कोशिश करें। इस खुशी को आप लाखों रुपए खर्च करके भी नहीं खरीद सकते।’
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और कई संस्थाओं के साथ स्वयंसेवक के तौर पर काम करने वाली पीतमपुरा निवासी प्रगति दोषी ने बताया कि जरूरतमंदों की मदद करना दोस्तों के साथ पार्टी करने से ज्यादा खुशी देता है।
कुछ पश्चिमी देशों में तीन मार्च को ‘आई वांट यू टू बी हैप्पी डे’’ मनाया जाता है। हमारे देश में इस दिन का चलन नहीं है लेकिन दूसरों को खुशी देने के लिए समर्पित इस दिन का महत्व जरूर समझ में आता है।
प्रगति ने कहा ‘मैं किसी भी खुशी के मौके पर पार्टी नहीं करती, बल्कि इसकी जगह पर मैं जरूरतमंद लोगों की जरूरतें पूरी करने में विश्वास रखती हूँ। मैं शहर के कई अनाथालयों में जाकर वहाँ बच्चों के बीच खिलौने और कपड़े बाँटती हूँ।’ प्रगति ने कहा ‘कई बच्चों को खिलौने देकर मैंने उनके चेहरे की खुशी को संजोकर रखने के लिए अपने कैमरे का उपयोग किया। इन फोटो ने मुझे दो प्रतियोगिताओं में जीत भी दिलाई।’
कुछ ऐसी ही कहानी शासकीय कर्मचारी आरके धोटे की भी है। ‘आसरा’ संस्था के लंबे समय से स्वयंसेवक धोटे अपना हर अवकाश संस्था में रह रहे बुजुर्गों की सेवा को समर्पित करते हैं।
धोटे ने बताया ‘मैंने हमेशा से बुजुर्गों की सेवा में दुनिया की खुशी देखी। इन बुजुर्गों के साथ थोड़ा समय बिताकर उनके सुख-दुख की बात करना उनके लिए सबसे बड़ी खुशी है।’ धोटे ने बताया ‘कभी-कभी बुजुर्ग अपने परिवार को याद कर परेशान हो जाते हैं। ऐसे में उनके साथ बैठना बहुत जरूरी हो जाता है। हम अगर किसी को खुशी देते हैं, तो इसमें हमारा कुछ नहीं जाता, लेकिन उनके चेहरे
पर आई मुस्कान जो सुकून देती है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल का काम है।’
कहानी
बुद्धिमान वैद्य
पुराने जमाने की बात है एक सेठ था। सेठ जिद्दी और बदपरहेज था। जवानी में ही खाँसी ने उसे परेशान कर रखा था। घरेलू इलाज से खाँसी ठीक नहीं हुई। होती भी कैसे? खाँसी के लिए दही अच्छा नहीं होता लेकिन सेठ जी दही के बिना भोजन ही नहीं करते थे। इससे खाँसी बढ़ती ही जाती थी। सेठ बहुत धनवान था। इसलिए शहर के अच्छे-अच्छे डॉक्टर, वैद्य, हकीम सबको दिखाया गया किंतु सेठ की खाँसी ठीक नहीं हुई। ठीक न होने का कारण था 'दही'। सेठ जी को बहुत लोगों ने समझाया लेकिन सेठ जी के समझ में बात नहीं आई।
एक बहुत बुद्धिमान वैद्य थे, वे सेठ जी का इलाज करने के लिए तैयार हो गए। सेठ बोला - 'वैद्य जी! एक बात मेरी सुन लो, मैं दही खाना नहीं छोड़ूँगा वैद्य ने कहा - 'कौन कहता है आपसे दही छोड़ने को। आप एक समय दही खाते हैं तो दोनों समय दही खाना शुरू कर दीजिए। यदि दो समय दही खाते हों तो चार समय खाना शुरू कर दीजिए।'
सेठ खुश हुआ कि यह वैद्य तो बहुत अच्छा है। वैद्य ने सेठ को बताया कि दही खाने के तीन लाभ हैं सेठ ने बड़ी उत्सुकता से पूछा - 'वे कौन से लाभ हैं? वैद्य जी बोले सर्वप्रथम तो घर में चोरी नहीं होती, दूसरा कुत्ता भी नहीं काटता, तीसरा उसको बुढ़ापा कभी नहीं आता।' सेठ ने सुना, वैद्य जी की बातों पर गौर भी किया, किंतु उसको इस बात का सिर पैर नहीं मिला। आखिर हारकर सेठ जी ने वैद्य जी से पूछा - 'वैद्य जी बात मेरी समझ में नहीं आई। वैद्य ने कहा - 'देखो सेठ जी! दही खाते रहने से खाँसी ठीक नहीं होती। खाँसी होने से दिन-रात आदमी खाँसता ही रहता है। यदि वह खाँसता ही रहता है, तो चोर चोरी कैसे कर सकता है। सेठ ने कहा - 'यह बात तो आपकी ठीक है।' अब दूसरी बात भी समझाइए।'
दूसरी बात भी सीधी-सादी है। वैद्य जी बोले - 'आप अपने को ही देख लीजिए। जब से आपको खाँसी हुई है तब से आप बहुत कमजोर हो गए हैं और उसका फल यह है कि आपके हाथ में लाठी हमेशा रहती है। जहाँ जाते हो लाठी के साथ ही जाते हो। कुत्ता लाठी देखकर आपके पास फटकेगा भी नहीं, काटने की बात तो दूर की है।' दूसरी बात सुनकर सेठ जी चुप हो गए। सेठ जी को फिक्र होने लगी फिर भी बोले - 'तीसरी बात क्या है।'
तीसरी बात तो सेठ जी ऐसी है है अब तुम ही जानों कमजोर आदमी कितने दिन जी सकता है। खाँसी में दही खाने वाला मरीज तो जवानी भी पूरी नहीं काट सकता इसलिए बुढ़ापा उसके पास फटकेगा कैसे?' वैद्य जी बात समाप्त करके चुप हो गए।
उस दिन के बाद सेठ जी ने दही नहीं खाया। दही में उनको अपनी मौत दिखाई देती थी। सेठ जी ने मौत के डर से दही छोड़ा तो खाँसी ने भी उनका साथ छोड़ दिया।
सौजन्य से - देवपुत्र
पुराने जमाने की बात है एक सेठ था। सेठ जिद्दी और बदपरहेज था। जवानी में ही खाँसी ने उसे परेशान कर रखा था। घरेलू इलाज से खाँसी ठीक नहीं हुई। होती भी कैसे? खाँसी के लिए दही अच्छा नहीं होता लेकिन सेठ जी दही के बिना भोजन ही नहीं करते थे। इससे खाँसी बढ़ती ही जाती थी। सेठ बहुत धनवान था। इसलिए शहर के अच्छे-अच्छे डॉक्टर, वैद्य, हकीम सबको दिखाया गया किंतु सेठ की खाँसी ठीक नहीं हुई। ठीक न होने का कारण था 'दही'। सेठ जी को बहुत लोगों ने समझाया लेकिन सेठ जी के समझ में बात नहीं आई।
एक बहुत बुद्धिमान वैद्य थे, वे सेठ जी का इलाज करने के लिए तैयार हो गए। सेठ बोला - 'वैद्य जी! एक बात मेरी सुन लो, मैं दही खाना नहीं छोड़ूँगा वैद्य ने कहा - 'कौन कहता है आपसे दही छोड़ने को। आप एक समय दही खाते हैं तो दोनों समय दही खाना शुरू कर दीजिए। यदि दो समय दही खाते हों तो चार समय खाना शुरू कर दीजिए।'
सेठ खुश हुआ कि यह वैद्य तो बहुत अच्छा है। वैद्य ने सेठ को बताया कि दही खाने के तीन लाभ हैं सेठ ने बड़ी उत्सुकता से पूछा - 'वे कौन से लाभ हैं? वैद्य जी बोले सर्वप्रथम तो घर में चोरी नहीं होती, दूसरा कुत्ता भी नहीं काटता, तीसरा उसको बुढ़ापा कभी नहीं आता।' सेठ ने सुना, वैद्य जी की बातों पर गौर भी किया, किंतु उसको इस बात का सिर पैर नहीं मिला। आखिर हारकर सेठ जी ने वैद्य जी से पूछा - 'वैद्य जी बात मेरी समझ में नहीं आई। वैद्य ने कहा - 'देखो सेठ जी! दही खाते रहने से खाँसी ठीक नहीं होती। खाँसी होने से दिन-रात आदमी खाँसता ही रहता है। यदि वह खाँसता ही रहता है, तो चोर चोरी कैसे कर सकता है। सेठ ने कहा - 'यह बात तो आपकी ठीक है।' अब दूसरी बात भी समझाइए।'
दूसरी बात भी सीधी-सादी है। वैद्य जी बोले - 'आप अपने को ही देख लीजिए। जब से आपको खाँसी हुई है तब से आप बहुत कमजोर हो गए हैं और उसका फल यह है कि आपके हाथ में लाठी हमेशा रहती है। जहाँ जाते हो लाठी के साथ ही जाते हो। कुत्ता लाठी देखकर आपके पास फटकेगा भी नहीं, काटने की बात तो दूर की है।' दूसरी बात सुनकर सेठ जी चुप हो गए। सेठ जी को फिक्र होने लगी फिर भी बोले - 'तीसरी बात क्या है।'
तीसरी बात तो सेठ जी ऐसी है है अब तुम ही जानों कमजोर आदमी कितने दिन जी सकता है। खाँसी में दही खाने वाला मरीज तो जवानी भी पूरी नहीं काट सकता इसलिए बुढ़ापा उसके पास फटकेगा कैसे?' वैद्य जी बात समाप्त करके चुप हो गए।
उस दिन के बाद सेठ जी ने दही नहीं खाया। दही में उनको अपनी मौत दिखाई देती थी। सेठ जी ने मौत के डर से दही छोड़ा तो खाँसी ने भी उनका साथ छोड़ दिया।
सौजन्य से - देवपुत्र
कविता
दया का अधिकार
जब एक हम्माल बोझा ढोता है,
थककर चूर हो जाता है,
उसकी साँस फूलती है।
मुझे उस पर दया आती है।
ताँगे में जुता हुआ घोड़ा,
दस लोगों का वजन ढोता है
उसके मुँह से झाग निकलते हैं।
मुझे उस पर दया आती है।
एक व्यक्ति सर्कस में शेर को,
कोड़ेमार करतब कराता है,
वह दर्द से दोहरा होता है।
मुझे उस पर दया आती है।
एक गधा अपनी पीठ पर,
मालिक का बोझा ढोता है,
वह भी थक-थक जाता है।
मुझे उस पर दया आती है।
एक बैल बैलगाड़ी में जुतकर,
वजन मुश्किल से उठाता है,
उसकी जान साँसत में आती है।
मुझे उस पर दया आती है।
मैं भी अपने वजन से कुछ कम,
बोझ का बस्ता ढोता हूँ।
हम्माल सी मेरी साँसें फूले,
घोड़े से झाग आते हैं।
रिंग मास्टर से अध्यापक हैं,
गधा कह वे मुझे बुलाते हैं।
बैल सा होमवर्क करता हूँ तो,
जान साँसत में आती है।
मैं तो सब पर दया बरसाता,
मुझ पर किसे दया आती है?
सौजन्य से - देवपुत्र
जब एक हम्माल बोझा ढोता है,
थककर चूर हो जाता है,
उसकी साँस फूलती है।
मुझे उस पर दया आती है।
ताँगे में जुता हुआ घोड़ा,
दस लोगों का वजन ढोता है
उसके मुँह से झाग निकलते हैं।
मुझे उस पर दया आती है।
एक व्यक्ति सर्कस में शेर को,
कोड़ेमार करतब कराता है,
वह दर्द से दोहरा होता है।
मुझे उस पर दया आती है।
एक गधा अपनी पीठ पर,
मालिक का बोझा ढोता है,
वह भी थक-थक जाता है।
मुझे उस पर दया आती है।
एक बैल बैलगाड़ी में जुतकर,
वजन मुश्किल से उठाता है,
उसकी जान साँसत में आती है।
मुझे उस पर दया आती है।
मैं भी अपने वजन से कुछ कम,
बोझ का बस्ता ढोता हूँ।
हम्माल सी मेरी साँसें फूले,
घोड़े से झाग आते हैं।
रिंग मास्टर से अध्यापक हैं,
गधा कह वे मुझे बुलाते हैं।
बैल सा होमवर्क करता हूँ तो,
जान साँसत में आती है।
मैं तो सब पर दया बरसाता,
मुझ पर किसे दया आती है?
सौजन्य से - देवपुत्र
मंगलवार, 2 मार्च 2010
क्या तुम जानते हो?
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए
तनाव से भरी भागती-दौड़ती इस जिंदगी में किसी के चेहरे पर खुशी बिखेरना शायद आसमान के तारे तोड़ना जितना कठिन काम है, लेकिन दुनिया में कई ऐसे लोग हैं, जो दूसरों को खुशी देना अपने जीवन का लक्ष्य बनाए हुए हैं।
बच्चों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘बालमन’ की संयोजक अन्वेषा खली ने बताया कि दुनिया के सितमों के मारे बच्चों के चेहरे पर खुशी देखना शायद जीवन का सबसे खुशनुमा पल होता है।
अन्वेषा ने कहा ‘दुनिया में बहुत से बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें प्यार करना तो दूर कोई दो शब्द ठीक से भी नहीं बोलता। हम कोशिश करते हैं कि ऐसे बच्चों को आत्मसम्मान और खुशी दे सकें।’ अन्वेषा ने कहा ‘मैं लोगों से अपील करती हूँ कि वे जिंदगी में एक बार अनाथ और बेसहारा बच्चों को खुशी देने की कोशिश करें। इस खुशी को आप लाखों रुपए खर्च करके भी नहीं खरीद सकते।’
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और कई संस्थाओं के साथ स्वयंसेवक के तौर पर काम करने वाली पीतमपुरा निवासी प्रगति दोषी ने बताया कि जरूरतमंदों की मदद करना दोस्तों के साथ पार्टी करने से ज्यादा खुशी देता है।
कुछ पश्चिमी देशों में तीन मार्च को ‘आई वांट यू टू बी हैप्पी डे’’ मनाया जाता है। हमारे देश में इस दिन का चलन नहीं है लेकिन दूसरों को खुशी देने के लिए समर्पित इस दिन का महत्व जरूर समझ में आता है।
प्रगति ने कहा ‘मैं किसी भी खुशी के मौके पर पार्टी नहीं करती, बल्कि इसकी जगह पर मैं जरूरतमंद लोगों की जरूरतें पूरी करने में विश्वास रखती हूँ। मैं शहर के कई अनाथालयों में जाकर वहाँ बच्चों के बीच खिलौने और कपड़े बाँटती हूँ।’ प्रगति ने कहा ‘कई बच्चों को खिलौने देकर मैंने उनके चेहरे की खुशी को संजोकर रखने के लिए अपने कैमरे का उपयोग किया। इन फोटो ने मुझे दो प्रतियोगिताओं में जीत भी दिलाई।’
कुछ ऐसी ही कहानी शासकीय कर्मचारी आरके धोटे की भी है। ‘आसरा’ संस्था के लंबे समय से स्वयंसेवक धोटे अपना हर अवकाश संस्था में रह रहे बुजुर्गों की सेवा को समर्पित करते हैं।
धोटे ने बताया ‘मैंने हमेशा से बुजुर्गों की सेवा में दुनिया की खुशी देखी। इन बुजुर्गों के साथ थोड़ा समय बिताकर उनके सुख-दुख की बात करना उनके लिए सबसे बड़ी खुशी है।’ धोटे ने बताया ‘कभी-कभी बुजुर्ग अपने परिवार को याद कर परेशान हो जाते हैं। ऐसे में उनके साथ बैठना बहुत जरूरी हो जाता है। हम अगर किसी को खुशी देते हैं, तो इसमें हमारा कुछ नहीं जाता, लेकिन उनके चेहरे
पर आई मुस्कान जो सुकून देती है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल का काम है।’
तनाव से भरी भागती-दौड़ती इस जिंदगी में किसी के चेहरे पर खुशी बिखेरना शायद आसमान के तारे तोड़ना जितना कठिन काम है, लेकिन दुनिया में कई ऐसे लोग हैं, जो दूसरों को खुशी देना अपने जीवन का लक्ष्य बनाए हुए हैं।
बच्चों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘बालमन’ की संयोजक अन्वेषा खली ने बताया कि दुनिया के सितमों के मारे बच्चों के चेहरे पर खुशी देखना शायद जीवन का सबसे खुशनुमा पल होता है।
अन्वेषा ने कहा ‘दुनिया में बहुत से बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें प्यार करना तो दूर कोई दो शब्द ठीक से भी नहीं बोलता। हम कोशिश करते हैं कि ऐसे बच्चों को आत्मसम्मान और खुशी दे सकें।’ अन्वेषा ने कहा ‘मैं लोगों से अपील करती हूँ कि वे जिंदगी में एक बार अनाथ और बेसहारा बच्चों को खुशी देने की कोशिश करें। इस खुशी को आप लाखों रुपए खर्च करके भी नहीं खरीद सकते।’
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और कई संस्थाओं के साथ स्वयंसेवक के तौर पर काम करने वाली पीतमपुरा निवासी प्रगति दोषी ने बताया कि जरूरतमंदों की मदद करना दोस्तों के साथ पार्टी करने से ज्यादा खुशी देता है।
कुछ पश्चिमी देशों में तीन मार्च को ‘आई वांट यू टू बी हैप्पी डे’’ मनाया जाता है। हमारे देश में इस दिन का चलन नहीं है लेकिन दूसरों को खुशी देने के लिए समर्पित इस दिन का महत्व जरूर समझ में आता है।
प्रगति ने कहा ‘मैं किसी भी खुशी के मौके पर पार्टी नहीं करती, बल्कि इसकी जगह पर मैं जरूरतमंद लोगों की जरूरतें पूरी करने में विश्वास रखती हूँ। मैं शहर के कई अनाथालयों में जाकर वहाँ बच्चों के बीच खिलौने और कपड़े बाँटती हूँ।’ प्रगति ने कहा ‘कई बच्चों को खिलौने देकर मैंने उनके चेहरे की खुशी को संजोकर रखने के लिए अपने कैमरे का उपयोग किया। इन फोटो ने मुझे दो प्रतियोगिताओं में जीत भी दिलाई।’
कुछ ऐसी ही कहानी शासकीय कर्मचारी आरके धोटे की भी है। ‘आसरा’ संस्था के लंबे समय से स्वयंसेवक धोटे अपना हर अवकाश संस्था में रह रहे बुजुर्गों की सेवा को समर्पित करते हैं।
धोटे ने बताया ‘मैंने हमेशा से बुजुर्गों की सेवा में दुनिया की खुशी देखी। इन बुजुर्गों के साथ थोड़ा समय बिताकर उनके सुख-दुख की बात करना उनके लिए सबसे बड़ी खुशी है।’ धोटे ने बताया ‘कभी-कभी बुजुर्ग अपने परिवार को याद कर परेशान हो जाते हैं। ऐसे में उनके साथ बैठना बहुत जरूरी हो जाता है। हम अगर किसी को खुशी देते हैं, तो इसमें हमारा कुछ नहीं जाता, लेकिन उनके चेहरे
पर आई मुस्कान जो सुकून देती है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल का काम है।’
कहानी
बुद्धिमान वैद्य
ओमप्रकाश बंछोर
पुराने जमाने की बात है एक सेठ था। सेठ जिद्दी और बदपरहेज था। जवानी में ही खाँसी ने उसे परेशान कर रखा था। घरेलू इलाज से खाँसी ठीक नहीं हुई। होती भी कैसे? खाँसी के लिए दही अच्छा नहीं होता लेकिन सेठ जी दही के बिना भोजन ही नहीं करते थे। इससे खाँसी बढ़ती ही जाती थी। सेठ बहुत धनवान था। इसलिए शहर के अच्छे-अच्छे डॉक्टर, वैद्य, हकीम सबको दिखाया गया किंतु सेठ की खाँसी ठीक नहीं हुई। ठीक न होने का कारण था 'दही'। सेठ जी को बहुत लोगों ने समझाया लेकिन सेठ जी के समझ में बात नहीं आई।
एक बहुत बुद्धिमान वैद्य थे, वे सेठ जी का इलाज करने के लिए तैयार हो गए। सेठ बोला - 'वैद्य जी! एक बात मेरी सुन लो, मैं दही खाना नहीं छोड़ूँगा वैद्य ने कहा - 'कौन कहता है आपसे दही छोड़ने को। आप एक समय दही खाते हैं तो दोनों समय दही खाना शुरू कर दीजिए। यदि दो समय दही खाते हों तो चार समय खाना शुरू कर दीजिए।'
सेठ खुश हुआ कि यह वैद्य तो बहुत अच्छा है। वैद्य ने सेठ को बताया कि दही खाने के तीन लाभ हैं सेठ ने बड़ी उत्सुकता से पूछा - 'वे कौन से लाभ हैं? वैद्य जी बोले सर्वप्रथम तो घर में चोरी नहीं होती, दूसरा कुत्ता भी नहीं काटता, तीसरा उसको बुढ़ापा कभी नहीं आता।' सेठ ने सुना, वैद्य जी की बातों पर गौर भी किया, किंतु उसको इस बात का सिर पैर नहीं मिला। आखिर हारकर सेठ जी ने वैद्य जी से पूछा - 'वैद्य जी बात मेरी समझ में नहीं आई। वैद्य ने कहा - 'देखो सेठ जी! दही खाते रहने से खाँसी ठीक नहीं होती। खाँसी होने से दिन-रात आदमी खाँसता ही रहता है। यदि वह खाँसता ही रहता है, तो चोर चोरी कैसे कर सकता है। सेठ ने कहा - 'यह बात तो आपकी ठीक है।' अब दूसरी बात भी समझाइए।'
दूसरी बात भी सीधी-सादी है। वैद्य जी बोले - 'आप अपने को ही देख लीजिए। जब से आपको खाँसी हुई है तब से आप बहुत कमजोर हो गए हैं और उसका फल यह है कि आपके हाथ में लाठी हमेशा रहती है। जहाँ जाते हो लाठी के साथ ही जाते हो। कुत्ता लाठी देखकर आपके पास फटकेगा भी नहीं, काटने की बात तो दूर की है।' दूसरी बात सुनकर सेठ जी चुप हो गए। सेठ जी को फिक्र होने लगी फिर भी बोले - 'तीसरी बात क्या है।'
तीसरी बात तो सेठ जी ऐसी है है अब तुम ही जानों कमजोर आदमी कितने दिन जी सकता है। खाँसी में दही खाने वाला मरीज तो जवानी भी पूरी नहीं काट सकता इसलिए बुढ़ापा उसके पास फटकेगा कैसे?' वैद्य जी बात समाप्त करके चुप हो गए।
उस दिन के बाद सेठ जी ने दही नहीं खाया। दही में उनको अपनी मौत दिखाई देती थी। सेठ जी ने मौत के डर से दही छोड़ा तो खाँसी ने भी उनका साथ छोड़ दिया।
सौजन्य से - देवपुत्र
ओमप्रकाश बंछोर
पुराने जमाने की बात है एक सेठ था। सेठ जिद्दी और बदपरहेज था। जवानी में ही खाँसी ने उसे परेशान कर रखा था। घरेलू इलाज से खाँसी ठीक नहीं हुई। होती भी कैसे? खाँसी के लिए दही अच्छा नहीं होता लेकिन सेठ जी दही के बिना भोजन ही नहीं करते थे। इससे खाँसी बढ़ती ही जाती थी। सेठ बहुत धनवान था। इसलिए शहर के अच्छे-अच्छे डॉक्टर, वैद्य, हकीम सबको दिखाया गया किंतु सेठ की खाँसी ठीक नहीं हुई। ठीक न होने का कारण था 'दही'। सेठ जी को बहुत लोगों ने समझाया लेकिन सेठ जी के समझ में बात नहीं आई।
एक बहुत बुद्धिमान वैद्य थे, वे सेठ जी का इलाज करने के लिए तैयार हो गए। सेठ बोला - 'वैद्य जी! एक बात मेरी सुन लो, मैं दही खाना नहीं छोड़ूँगा वैद्य ने कहा - 'कौन कहता है आपसे दही छोड़ने को। आप एक समय दही खाते हैं तो दोनों समय दही खाना शुरू कर दीजिए। यदि दो समय दही खाते हों तो चार समय खाना शुरू कर दीजिए।'
सेठ खुश हुआ कि यह वैद्य तो बहुत अच्छा है। वैद्य ने सेठ को बताया कि दही खाने के तीन लाभ हैं सेठ ने बड़ी उत्सुकता से पूछा - 'वे कौन से लाभ हैं? वैद्य जी बोले सर्वप्रथम तो घर में चोरी नहीं होती, दूसरा कुत्ता भी नहीं काटता, तीसरा उसको बुढ़ापा कभी नहीं आता।' सेठ ने सुना, वैद्य जी की बातों पर गौर भी किया, किंतु उसको इस बात का सिर पैर नहीं मिला। आखिर हारकर सेठ जी ने वैद्य जी से पूछा - 'वैद्य जी बात मेरी समझ में नहीं आई। वैद्य ने कहा - 'देखो सेठ जी! दही खाते रहने से खाँसी ठीक नहीं होती। खाँसी होने से दिन-रात आदमी खाँसता ही रहता है। यदि वह खाँसता ही रहता है, तो चोर चोरी कैसे कर सकता है। सेठ ने कहा - 'यह बात तो आपकी ठीक है।' अब दूसरी बात भी समझाइए।'
दूसरी बात भी सीधी-सादी है। वैद्य जी बोले - 'आप अपने को ही देख लीजिए। जब से आपको खाँसी हुई है तब से आप बहुत कमजोर हो गए हैं और उसका फल यह है कि आपके हाथ में लाठी हमेशा रहती है। जहाँ जाते हो लाठी के साथ ही जाते हो। कुत्ता लाठी देखकर आपके पास फटकेगा भी नहीं, काटने की बात तो दूर की है।' दूसरी बात सुनकर सेठ जी चुप हो गए। सेठ जी को फिक्र होने लगी फिर भी बोले - 'तीसरी बात क्या है।'
तीसरी बात तो सेठ जी ऐसी है है अब तुम ही जानों कमजोर आदमी कितने दिन जी सकता है। खाँसी में दही खाने वाला मरीज तो जवानी भी पूरी नहीं काट सकता इसलिए बुढ़ापा उसके पास फटकेगा कैसे?' वैद्य जी बात समाप्त करके चुप हो गए।
उस दिन के बाद सेठ जी ने दही नहीं खाया। दही में उनको अपनी मौत दिखाई देती थी। सेठ जी ने मौत के डर से दही छोड़ा तो खाँसी ने भी उनका साथ छोड़ दिया।
सौजन्य से - देवपुत्र
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