बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

क्या तुम जानते हो?

हँसने का प्रारम्भ कब और कैसे?

हँसने का प्रारंभ कब और कैसे हुआ था? वैज्ञानिकों ने अब इस प्रश्न का जवाब खोज निकाला है। उनके अनुसार अब से चालीस लाख साल पहले जब व्यक्ति ने चार के बजाए दो पैरों पर चलने का प्रयास किया तो वह लड़खड़ाया और गिरा। उसके इस लड़खड़ाने एवं गिरने पर उसके साथी हँसे। यही हँसने की शुरुआत है।

इस थ्योरी के अनुसार जब वे अपने ग्रुप के किसी व्यक्ति को लड़खड़ाते हुए देखते थे, तो हँसते थे। उनका हँसना इस बात का संकेत होता था कि चलने के प्रयास में कुछ कमी है। इस थ्योरी से यह भी ज्ञात होता है कि किसी के फिसलने या लड़खड़ाने पर हम आज भी क्यों हँसते हैं एवं यह फिल्मों में स्लैपस्टिक हास्य का चिरस्थायी हिस्सा क्यों बन गया है।

प्राचीन युग में दो पैरों पर चलने का अर्थ यह होता था कि लड़खड़ाने व गिरने की आशंका अधिक थी। वास्तव में तात्पर्य यह है कि स्लैपस्टिक हास्य का विकास उसी समय से हुआ। ऐसा मैथ्यू गर्वेस का कहना है। वे अमेरिका में एवोल्यूशनरी बायोलॉजिस्ट हैं। उन्हीं के नेतृत्व में यह अध्ययन हुआ था। वे कहते हैं, 'जब हम स्लैपस्टिक पर हँसते हैं, तो हम उसी चीज पर हँस रहे होते हैं, जिस पर हमारे प्रारंभिक पूर्वज हँसे थे। तभी हमें यह बात मजेदार एवं हास्य से भरी लगती है।

भाषा का विकास पहली हँसी के बीस लाख वर्ष पश्चात हुआ। इसके पश्चात ही शब्दों एवं हास्य के विभिन्न तरीकों को जोड़ा जाने लगा ताकि चुटकुले बनाए जा सकें या किसी का मजाक उड़ाया जा सके। गर्वेस एवं उनके साथी डेविड स्लोन विलसन ने अपने अध्ययन का विकास हास्य पर 100 से अधिक थ्योरियों की समीक्षा करने के पश्चात किया।

इन शोधकर्ताओं का मानना है कि हँसने से पहले व्यक्ति वैसी आवाजें निकलता था, जैसी वानर चिम्पांजी गुदगुदी किए जाने पर निकालते हैं। इन आवाजों के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि यह परिवार या ग्रुप में अच्छे संबंधों को बनाए रखने हेतु निकाली जाती है। इसके अनुसार किसी व्यक्ति को अचानक फिसलते हुए देखकर और साथ ही यह अहसास करते हुए कि इससे उस व्यक्ति को कोई चोट नहीं आएगी; आज भी मानव को हँसी आ जाती है।

कहानी

जादूगर चाचा...

पंडित जवाहरलाल नेहरू मजेदार बातों के एक ऐसे जादूगर भी थे, जो एक मिनट के भीतर क्या से क्या कर सकते थे? नेहरूजी को भाषा पर अधिकार था। वे बहुत अच्छा बोलते थे।
जीवन भर तुनकते-तपते नेहरूजी, संसार में अपनी, भारत की और अहिंसा की नीति का आदर पाकर अपनी सारी गर्मी, उत्तेजना और झुंझलाहट को अपने भीतर से निकाल चुके थे।
एक बार कांग्रेस महासमिति के अधिवेशन के समय बड़ी भीड़ हुई। भीड़ इतनी बढ़ी कि महिलाओं के बैठने के स्थान के पीछे पुरुषों की भारी भीड़ जमा होकर उमड़ पड़ी।
नेहरूजी से देखा न गया, वे माइक पर आए, भीड़ की ओर देखा और बोले, आप पुरुष होकर महिलाओं में आ रहे हैं? जिनको आना हो वे सानंद आ सकते हैं, हमारी मुबारकबाद।
उफनते हुए दूध पर जैसे पानी के ठंडे छींटे पड़ गए, भीड़ पीछे खिसक गई! नेहरूजी को इतिहास के पन्नों में 'मजेदार बातों का जादूगर' भी कहा जाता है।
चतुर कविराज
एक थे चतुर कविराज, उन्हें था अपनी अकल पर बड़ा नाज। वो थे भी होशियार, राजा भी उनकी हर बात मानने को हो जाते थे तैयार।
एक दिन कविराज ने एक कविता लिखी, सुनकर राजा की तबियत खिली। बोले-'बोलो क्या माँगते हो, क्या इनाम चाहते हो।' कविराज ने सोचा देखते हुए ऊपर, फिर दिया कुछ देर बाद उत्तर-'महाराज मुझे तो दे दीजिए एक शिकारी कुत्ता' सुनकर सारे दरबारी हुए हक्का-बक्का।
सब दरबारियों ने सोचा कविराज ने एक अवसर खो दिया, खनखनाते सिक्कों से हाथ धो लिया। राजा ने कहा-'जो तुमने माँगा है वह मिल जाएगा, शिकारी कुत्ता तुम्हें दे दिया जाएगा।'
कविराज ने कहा-'महाराज आप हैं बहुत दयावान, यदि घोड़ा भी होता मेरे पास तो मैं शिकार पर जाता श्रीमान।' राजा ने कहा-'घोड़ा भी दे देते हैं, तुम्हारी इच्छा पूरी कर देते हैं।'
कविराज ने आगे कहा-'जब भी शिकार मेरे साथ आए, तो चाहता हूँ कि कोई उसे पकाकर खिलाए।'
राजा ने उसे रसोइया भी दे दिया, पर आगे कविराज ने कहा-'आपकी उदारता का नहीं है जवाब, पर मैं इतने सारे उपहार कहाँ रखूँगा जनाब?' राजा ने उसे एक महल भी दे दिया, कविराज का मन अभी भी नहीं था भरा।
फिर उसने कहा-'मैं इतनी बड़ी व्यवस्था को संभालूँगा कैसे, यह सब काम होगा कैसे?' राजा ने कहा मैं दूँगा तुम्हें एक खजूर का बाग, उसमें जमा लेना अपना सारा काम। 'मैंने देखी नहीं ऐसी दयालुता, ऐसी उदारता। मैंने जो चाहा आपने दिया। आप हैं कविता के सही कदरदान, मेरा आभार स्वीकार करें श्रीमान।'
वसंत का रहस्य

वसंत का मौसम सचमुच कितना खुशनुमा लगता है। वन में, बगियों में रंग-बिरंगे फूल खिले रहते हैं। आम की शाखा पर कोपले पंचम स्वर में कूँकती रहती हैं। भँवरे और तितली फूलों पर मँडराते रहते हैं, सूरजमुखी एवं सरसों के फूलों से अटे खेत सोने की तरह चमकते दिखाई देते हैं।
द्धि, विद्या और वाणी की देवी 'सरस्वती' का जन्मदिन 'वसंत पंचमी' के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देवी सरस्वती की आराधना की जाती है। इस दिन पीले वस्त्र पहनना तथा पीले व्यंजन खाना शुभ समझा जाता है। वसंत ऋतु की भी एक हानि है। यूनान में अनाज और कृषि की एक देवी मानी जाती है, जिसे 'डैमेटर' कहते हैं। किसी समय इस देवी के एक रूपवान लड़की थी, जिसका नाम था फलेरी। ऐसे ही एक बार जब यूनान में वसंत ऋतु चल रही थी तो फलेरी ने चुपचाप अपनी माँ का सोने का रथ हाँका और वह आसमान से धरती पर उतरी, अपने रथ को धरती के राजा प्लेटो के शाही बगीचे में ले जाकर मस्त-मस्त रंग-बिरंगे खुशबूदार फूलों के बीच घूमने-फिरने लगी, कभी फूल तोड़ने लगी तो कभी प्यारी-प्यारी तितलियाँ पकड़ने लगी..।
राजा प्लेटो जब किसी काम से अपने शाही उपवन में आया तो उसकी नजर फूलों के बीच खड़ी खूबसूरत फलेरी पर अटकी। वह उस पर मोहित हो गया। उसने तरकीब से उसका अपहरण कर अपने महल में ले गया और उसके साथ चुपचाप विवाह रचा लिया।
इधर जब डैमेटर को अपनी बेटी स्वर्ग लोक में कहीं दिखाई न दी तो वह पृथ्वी पर उतरी। उसने पृथ्वी का चप्पा-चप्पा छान मारा, किंतु उसे अपनी बेटी कहीं नहीं मिली। अंत में वह निराश होकर एक पेड़ के नीचे बैठकर रोने लगी, जब सूर्य देवता ने डैमेटर को इस तरह रोते देखा तो उन्हें दया आ गई। उन्होंने फलेरी का पता उसे बता दिया। यह अनोखी खबर सुनते ही डैमेटर गुस्से में आग बबूला हो गई। आखिर वह भी एक देवी थी। राजा प्लेटो की यह मजाल कि वह उसकी बेटी को इस तरह चुराकर अपने महल में रख ले। उसने तुरंत घोषणा कर दी। पृथ्वी पर अनाज का एक भी दाना तब तक न निकले, जब तक कि उसकी बेटी उसे वापस नहीं मिल जाती। किसानों ने अपने खेतों में जी-तोड़ मेहनत की, खेतों को खाद से पाट दिया, किंतु सब व्यर्थ, अनाज का एक भी दाना नहीं उगा, अब तो पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मचने लगी। खलिहान सूने पड़े रहे। सभी देवताओं को चिंता होने लगी कि कहीं पृथ्वी पर अकाल न पड़ जाए? अंत में देवताओं के राजा जुपिटर ने यह निश्चय किया कि उसे शीघ्र ही इन दोनों में कोई समझौता करा देना चाहिए, नहीं तो अनर्थ हो जाएगा, उसने डैमेटर से आग्रह किया कि वह अपना कड़ा प्रतिबंध पृथ्वी से हटा ले...।
लेकिन, डैमेटर तो अड़ी हुई थी कि जब तक उसे अपनी बेटी वापस नहीं मिल जाती, वह पृथ्वी पर एक भी बीज नहीं फूटने देगी। इधर प्लेटो भी फलेरी को छोड़ना नहीं चाहता था। अंत में जुपिटर ने दोनों के बीच एक समझौता कराया कि फलेरी छः महीने राजा प्लेटो के पास रहेगी और छः महीने अपनी माँ के पास।
फलेरी जब अपने पति के पास होती है तो बसंत ऋतु आ जाती है, फूल खिलकर महकने लगते हैं। वृक्षों पर कोयल की सुरीली आवाज सुनाई देने लगती है और जब छः महीने के लिए अपनी प्यारी-प्यारी माँ के पास लौटती है तो पृथ्वी पर पतझड़ आ जाता है।


भगवान का साथ

एक समय की बात है। एक छोटे बच्चे ने जब बचपन से जवानी में प्रवेश किया। तब वह कहीं भी जाता तो उसके पदचिह्न के साथ एक और पदचिह्न नजर आते थे, लेकिन जब वह बूढ़ा हुआ तो ये पदचिह्न नजर आना बंद हो गए।
जब वह मरने के बाद भगवान के पास गया और उसने भगवान से प्रश्न पूछा- जब तक मैं जवान था तब तक मुझे मेरे पदचिह्न
के साथ एक और पदचिह्न नजर आते थे, तब भगवान ने कहा- वह मेरे पदचिह्न थे। इस पर उसने पूछा- जब मुझे बुढ़ापे में आपकी जरूरत थी। तब आपने मेरा साथ छोड़ दिया।
तब भगवान ने कहा- तब तू चल नहीं सकता था। तब मैं ही तुझे उठाकर चल रहा था। इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हर क्षण- हर वक्त भगवान हमारे साथ हैं।

काव्य-संसार

औरत की लड़ाई
NDऔरत की लड़ाई
किसी एक से नहीं
पूरी दुनिया से होती है बेटा
कहा करती थी माँ
जब मैं था छोटा बच्चा,
तब इस बात का अर्थ
मैं समझ नहीं पाता था
और यह सोचकर चुप रह जाता था
कि माँ की तो आदत ही है
बात-बेबात बोलते रहने की

अब माँ नहीं है
और मैं हो गया हूँ बहुत बड़ा
अब कहीं जाकर समझ पाया हूँ
कि वास्तव में ही
औरत की लड़ाई
किसी एक से नहीं
पूरी दुनिया से होती है।
और लड़ने वालों का कमाल देखिए
कि वे सब एकजुट होकर
लड़ते हैं उसके खिलाफ
जैसे एकमात्र वही शत्रु हो
पूरी दुनिया में उनकी,
जबकि औरत इस लड़ाई में
बिखरी होती है अपने आप में

कभी उसकी आँख
लड़ रही होती है किसी एक से
तो कभी उसके हाथ
लड़ रहे होते हैं किसी दूसरे से
साथ ही उसका पेट लड़ रहा होता है
किसी तीसरे से
उसकी पीठ लड़ रही होती है
किसी चौथे से।
NDउसके खिलाफ लड़ने वालों में
पुरुष ही नहीं होते
होती हैं औरतें भी
पति के साथ-साथ लड़ता है
उसके खिलाफ
उसका पिता और भाई भी
उसका पिता और भाई
उसका बेटा ही नहीं
उसके खिलाफ लड़ती है
उसकी बेटियाँ भी।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

हँसगुल्ले

अछूती विद्या!

पत्नी- 'जहाँ भी मैं पैसे रखती हूँ, टोनी चुरा लेता है। मैं क्या करूँ?
पति- 'तुम आइंदा से पैसे उसकी नोटबुक में रखा करना। मैं शर्त लगाता हूँ, पैसे सुरक्षित रखे
रहेंगे, क्योंकि नोटबुक वह छूता तक नहीं।

खुलासा!
माँ : बबली, तू इतनी आलसी क्यों है?'
बबली : 'मैन्यूफैक्चरिंग डिफेक्ट की वजह से माँ?'

सफेद होने का भेद!
पिंकी- 'मम्मी, मम्मी! आपके सिर में दो सफेद बाल भी हैं। ये बाल क्यों आ गए मम्मी?
मम्मी- 'जो बच्ची, अपनी मम्मी को जितना तंग करती है, मम्मी के उतने ही बाल सफेद हो जाते हैं। समझी?'
पिंकी- हूँ...। तभी मैं सोचूँ, नानी के सिर के पूरे ही बाल क्यों सफेद हो गए।'

भुतहा भविष्य : (क्या और क्यों?)
नीता : 'क्या सचमुच कार्ड के आधार पर भविेष्यवाणी की जा सकती है?'
पप्पू : 'हाँ बिल्कुल ! मेरी मम्मी की ही मिसाल लो। वे मेरा रिजल्ट कार्ड देखकर आराम से बता देती हैं कि शाम घर आने के बाद मेरे पापा मेरी हड्डियों के साथ क्या सलूक करेंगे?'

कहानी

चुन्‍नी का एक रुपया


NDNDदीपावली का दिन था। सभी लोग प्रसन्न थे। चुन्नी के छोटे से मोहल्ले में रहने वाले सभी लोग बाजार से कुछ न कुछ खरीददारी करके लौट रहे थे। चुन्नी उदास थी क्योंकि उसके पास खरीददारी करने के लिए पैसा नहीं था। पिछले दिनों से चुन्नी के घर की हालत जो ठीक नहीं थी। पड़ोस में रहने वाला कोई भी बाजार से कुछ खरीदकर लाता तो चुन्नी उससे पूछती कि बाजार में क्या-क्या मिल रहा है। किसी ने उसे बताया कि आज तो बाजार में रौनक है। सबकुछ मिल रहा है। लोग आवाजें लगा-लगाकर बुला रहे हैं और बहुत सस्ते में सामान मिल रहा है।

एक रुपया भी हो तो बहुत सी चीजें खरीदी जा सकती है। चुन्नी ने सोचा कि काश उसके पास भी एक रुपया होता। यह सोचकर वह उदास सी बैठ गई। मन ही मन वह बाजार के बारे में सोचती जा रही थी और पर उसके चेहरे पर खुशी के बजाय उदासी थी क्योंकि घर की हालत उसे मालूम थी।

जब चुन्नी इस तरह से बैठी थी तभी उसके घर के सामने से एक अम्मा निकली। अम्मा का नाम था लक्ष्मी। नाम भी लक्ष्मी और दिखने में भी बिलकुल लक्ष्मीजी। सुंदर चेहरा और माथे पर गोल बिंदी। उन्होंने चुन्नी को देखा तो पूछा- अरे बेटी, आज तो दिवाली का दिन है। सभी लोग कितने खुश हैं और तुम उदास क्यों बैठी हो। चुन्नी ने कहा- कि मेरे पास पैसे नहीं है ना। आज बाजार में कितनी अच्छी-अच्छी चीजें मिल रही है पर मैं कुछ भी नहीं खरीद सकती हूँ।

लक्ष्मी अम्मा ने कहा- बस इतनी सी बात। कितने पैसे चाहिए तुम्हें? बस मुझे एक रुपिया चाहिए। चुन्नी ने कहा। बस एक रुपिया? हाँ, मैंने अभी सुना है कि एक रुपिए में तो बाजार से सबकुछ खरीदा जा सकता है। लक्ष्मी अम्मा ने अपने पल्लू से एक रु. का सिक्का छुड़ाया और चुन्नी के हाथ में रख दिया। जाते-जाते उन्होंने कहा कि लो इस एक रुपिए में तुम्हें बाजार में सारी चीजें मिल जाएँगी। अब चुन्नी खुश हो गई। उसके पास रुपिया था। और वह बाजार चली।

बाजार में सबसे पहले वह फूल वाले के पास गई। उसने पूछा फूल कैसे दिए हैं? फूल वाले ने कहा कि दो रुपये में टोकनी भर। चुन्नी ने कहा पर मेरे पास तो एक ही रुपिया है। मैंने तो सुना है कि आज बाजार में एक ही रुपिए में सबकुछ मिल रहा है। चुन्नी की बात सुनकर फूल वाले ने कहा तुम तो खुद ही फूल जैसी हो, तो तुम बिना कुछ दिए ही फूल ले सकती हो। चुन्नी ने फटाफट फूल चुन लिए और आगे बढ़ी।

रुपिया अब भी उसके पास था और उसे विश्वास था कि अभी भी बहुत सी चीजें खरीदी जा सकती है। फिर चुन्नी ने रांगोली वाले से रंगों के बारे में पूछा। रांगोली वाले ने कहा कि चार रंगों की पुड़िया दो रुपए की है। चुन्नी ने कहा कि उसके पास तो एक ही रुपिया है, रांगोली वाले कहा कि आज मेरी बिक्री अच्छी हुई है तो तुम कुछ रंग मेरी तरफ से रखो। भई चुन्नी तो खुश ही खुश। एक रुपिए में ही उसने दो चीजें खरीद ली और रुपिया अभी भी उसके हाथ में था।

इसके बाद वह दीपक बेचने वाली कुम्हारिन माई के पास पहुँची। कुम्हारिन माई अपनी दुकान समेट ही रही थी। चुन्नी ने कहा कि उसे चार दीपक चाहिए। कुम्हारिन के कहा कि उसका तो सब सामान बिक गया है। पर तभी कुम्हारिन ने अपने पड़ोस में बैठे शंकरया से पूछा- क्यों रे शंकरया तेरे पास चार दीए हैं क्या? शंकरया ने कहा ये लो माई। माई ने कहा कितने पैसे? शंकरया ने कहा माई तुझसे क्या पैसे लूँ।

माई ने चुन्नी को दीए दे दिए। चुन्नी ने पूछा-कितने पैसे दूँ? माई ने कहा दीए शंकरया के दीए हैं और जब उसे पैसे नहीं चाहिए तो मैं क्यों लूँ? तुम खुश रहो। चुन्नी को जो कुछ चाहि‍ए था सब मि‍ल गया। वह बाजार से लौट आई सचमुच एक रुपए में उसे सारी चीजें मि‍ल गई थी। और उसके हाथ में रुपया अभी भी जगमगा रहा था। चुन्‍नी ने शाम को घर के बाहर रंगोली बनाई। घर के द्वार पर फूलों का वंदनवार लगाया और दि‍ए जलाए। चुन्‍नी ने आँखें बंद कर लक्ष्‍मी जी को याद कि‍या तो उसे लक्ष्‍मी अम्‍मा का चेहरा ध्‍यान आया।

साक्षात्कार

प्रधानमंत्री सशक्त और ईमानदार हो-किरण बेदी
बुद्धि, कौशल हर चीज में किरण लड़कों से कम नहीं। 'लोग क्या कहेंगे' इस बात की किरण ने कभी भी परवाह नहीं करते हुए अपनी जिंदगी के मायने खुद निर्धारित किए। अपने जीवन व पेशे की हर चुनौती का हँसकर सामना करने वाली किरण बेदी साहस व कुशाग्रता की एक मिसाल हैं, जिसका अनुसरण इस समाज को एक सकारात्मक बदलाव की राह पर ले जाएगा। 'क्रेन बेदी' के नाम से विख्यात इस महिला ने बहादुरी की जो इबारत लिखी है, उसे सालों तक पढ़ा जाएगा।

हमने की खास मुलाकात किरण बेदी जी के साथ।

प्रश्न : जब आप आईपीएस चुनी गईं तब समाज में महिलाओं का पुलिस सेवा में जाना अच्छा नहीं माना जाता था। क्या आपको परिवार की ओर से इस तरह की कोई दिक्कत पेश हुई?
उत्तर : परिवार अगर विरोध करता तो शायद मैं इस पोजीशन तक नहीं पहुँच पाती। किरण बेदी अपने परिवार का ही प्रोडक्ट थी परंतु यह सच है कि उस समय महिलाओं का पुलिस सेवा में जाना समाज की दृष्टि में ठीक नहीं माना जाता था।

प्रश्न : आपकी सफलता में आपके पति का कितना योगदान रहा?
उत्तर : मेरे पति का मेरी हर कामयाबी में भरपूर योगदान रहा। मेरी हर सफलता को वे अपनी सफलता मानते हैं।

स्वयंसेवी संस्थाएँ जुड़े

जो हमने तिहाड़ जेल में किया वो देश की हर जेल में हो सकता है। इसके लिए आवश्यकता है कि स्वयंसेवी संस्थाओं को इस कार्य में जोड़ा जाए। जितनी ज्यादा स्वयंसेवी संस्थाएँ इस पुनीत कार्य से जुड़ेंगी उतना ही अधिक सुधार होगा

प्रश्न : आपकी कचहरी के माध्यम से जनता से सीधे संवाद करने का आपका अनुभव कैसा रहा?
उत्तर : इस कार्यक्रम के माध्यम से हमें एक सामाजिक जरूरत का पता लगा कि आज देश को ऐसे ही फोरम की जरूरत है। वो चाहते हैं कि कोई तुरंत न्याय वाले माध्यम से उनकी कोई मदद करे। ऐसा कोई फोरम हो जिसमें एक ही सुनवाई के भीतर लोगों को त्वरित न्याय मिले। आज यह कार्यक्रम लोगों को न्याय दिलाने का एक माध्यम बन रहा है।

प्रश्न : क्या आपको ऐसा लगता है कि भारतीय न्याय प्रणाली की सुस्तैल व्यवस्था के कारण कई वर्षों तक न्यायालयों में ही प्रकरण लंबित पड़े रहते हैं और लोग न्याय की गुहार करते-करते ही अपने जीवन का आधा समय व्यतीत कर देते हैं?
उत्तर : ये हकीकत है कि न्याय मामले लंबित हैं व न्यायालय में मुकदमों की सुनवाई में सालों लग जाते हैं। सीनियर ज्यूडीशरी ने भी इसे स्वीकारा है कि हमारे यहाँ अदालतों में बहुत एरियर्स हैं। लोगों को विश्वास नहीं है कि उन्हें न्याय मिल ही जाएगा। इसलिए वो दूसरे रास्ते ढूँढ़ते हैं और उनको कुछ मिलता नहीं है। कोर्ट में मुकदमे बहुत अधिक हैं व उनकी सुनवाई करने वाले जजों की संख्या बहुत कम है, इसीलिए तो वर्तमान में लोक अदालत की लोकप्रियता बढ़ रही है, लेकिन आज भी बहुत सारी ऐसी बिजली अदालत और लोक अदालत की जरूरत है।

प्रश्न : जिस तरह से आपके प्रयासों से तिहाड़ जेल ‘तिहाड़ आश्रम’ में बदल गई, क्या आप मानती हैं कि आज देश की हर जेल को भी तिहाड़ जेल की तरह आश्रम बनाना चाहिए?
उत्तर : जो हमने तिहाड़ जेल में किया वो देश की हर जेल में हो सकता है। इसके लिए आवश्यकता है कि स्वयंसेवी संस्थाओं को इस कार्य में जोड़ा जाए। जितनी ज्यादा स्वयंसेवी संस्थाएँ इस पुनीत कार्य से जुड़ेंगी उतना ही अधिक सुधार होगा तथा कैदियों को शिक्षा के साथ स्वावलंबन के अन्य कार्यों का भी प्रशिक्षण मिलेगा। इससे उनकी आपराधिक प्रवृत्तियों पर अंकुश लगेगा।

प्रशन : आज भी भारतीय महिलाएँ पिछड़ी हैं। उन पर अत्याचार हो रहे हैं। इसके पीछे क्या कारण है?
उत्तर : उनकी परवरिश ठीक नहीं है। कहीं स्कूल दूर है तो कहीं उन्हें रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण नहीं मिल पा रहा है। वे जो पढ़ना चाहती हैं वह पढ़ नहीं पाती हैं। वे जो काम करना चाहती हैं कर नहीं पाती हैं। इस प्रकार वे मजबूर होघर कामकाज में ही अपनी सारी जिंदगी गुजार देती हैं। आज शादी ही भारतीय महिलाओं के जीवन का एक आधार है जो कि नहीं होना चाहिए। अगर शादी सफल हुई तो उनका जीवन अच्छा है अन्यथा बर्बाद है।

प्रश्न : आपके अनुसार देश का प्रधानमंत्री कैसा होना चाहिए?
उत्तर : देश का प्रधानमंत्री ईमानदार और मजबूत होना चाहिए, लेकिन उसके पीछे मेजोरिटी भी होना चाहिए। अगर मेजोरिटी नहीं है या उस पर ऐसे गठजोड़ हैं जो हर चीज पर कभी हाँ और कभी ना करें तो वो सरकार क्या चलेगी। तो ये गणित नहीं है। यदि वो खुद ही असुरक्षित हो, उसके पास नंबर ही नहीं हो, गणित ही नहीं हो तो वो क्या करेगा। प्रधानमंत्री के पीछे आइडियोलॉजी और सशक्त पार्टी होना चाहिए।

प्रश्न : आपने राजनीति में रुचि क्यों नहीं ली?
उत्तर : क्योंकि मेरी इसमें रुचि नहीं है। पब्लिक लाइफ में मेरी रुचि शत प्रतिशत है, लेकिन पॉलीटिकल लाइफ में बिलकुल नहीं है।

आज का विचार

उद्देश्य ही जीवन को सार्थक बनाता है, जैसे ऋतुएँ प्रकृति में छटाएँ बिखेरती हैं।
•रवीन्द्रनाथ टैगोर